सरकारी आंकड़ों ने बढ़ती मानव-हाथी संघर्ष की गंभीर तस्वीर पेश की

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एबी न्यूज़ नेटवर्क। वर्ष 2021 से 2025 के बीच के सरकारी आंकड़ों ने देश में वन्यजीवों और इंसानों के बीच बढ़ते संघर्ष की चिंताजनक तस्वीर सामने रखी है। आंकड़ों के अनुसार, इस पांच वर्षीय अवधि में हाथियों के हमलों में 2,898 लोगों की मौत हुई, जबकि बाघों के हमलों में 393 लोगों ने जान गंवाई। यानी हाथियों के कारण होने वाली मौतों की संख्या बाघों की तुलना में लगभग सात गुना अधिक रही। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति मानव-हाथी संघर्ष के लगातार बढ़ते दायरे की ओर इशारा करती है। वन क्षेत्रों में मानवीय दखल, जंगलों का सिकुड़ना और प्राकृतिक संसाधनों की कमी के कारण हाथियों का आबादी वाले इलाकों की ओर रुख बढ़ा है, जिससे जान-माल का नुकसान भी बढ़ रहा है।
महाराष्ट्र में बाघों के हमले सबसे ज्यादा
राज्यों के आंकड़ों पर नजर डालें तो हाथियों के हमलों से सबसे अधिक 650 मौतें ओडिशा में दर्ज की गईं। इसके बाद झारखंड में 471 और असम में 427 लोगों की जान गई। दूसरी ओर, बाघों के हमलों के मामले में महाराष्ट्र सबसे ऊपर रहा, जहां पांच वर्षों में 231 लोगों की मौत हुई। उत्तर प्रदेश में 52 और मध्य प्रदेश में 39 लोगों की मौत दर्ज की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के कई क्षेत्रों में घनी आबादी और हाथियों के पारंपरिक आवास एक-दूसरे से सटे हुए हैं। ऐसे में इंसानों और हाथियों का आमना-सामना अधिक होता है, जिससे संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। वहीं महाराष्ट्र में बाघों की संख्या और मानव बस्तियों के समीप उनकी मौजूदगी के कारण बाघों से जुड़े हमले अपेक्षाकृत अधिक सामने आए हैं।
भविष्य के लिए चेतावनी
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, जंगलों का लगातार कम होना, आवासों का खंडित होना, हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों का बाधित होना और मानव बस्तियों का विस्तार इस समस्या की प्रमुख वजह हैं। भोजन और पानी के प्राकृतिक स्रोत घटने से हाथी गन्ना, धान, मक्का और केले जैसी फसलों की तलाश में खेतों और गांवों की ओर पहुंच रहे हैं। इससे इंसानों और हाथियों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं। हालांकि महाराष्ट्र में फिलहाल हाथियों से जुड़ा संघर्ष सीमित है, लेकिन विदर्भ के कुछ इलाकों में हाथियों की आवाजाही भविष्य के लिए चेतावनी मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी से संरक्षण योजनाओं को मजबूत नहीं किया गया और वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन के लिए प्रभावी कॉरिडोर विकसित नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में मानव-हाथी संघर्ष और गंभीर रूप ले सकता है।