‘दिलखुलास गप्पा’ में दिग्गज अभिनेता अशोक सराफ ने साझा किए अभिनय के अनुभव

    20-Aug-2026
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नागपुर। व
रिष्ठ अभिनेता अशोक सराफ ने कहा कि कलाकार का असली काम किसी व्यक्ति की नकल करना नहीं, बल्कि किरदार के प्रति ईमानदार रहना है। भूमिका निभाते समय उसके स्वभाव, मानसिकता और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार को समझना जरूरी है। किरदार किसी वास्तविक व्यक्ति से मिलता-जुलता हो, तब भी कलाकार को उस समानता के बजाय लेखक द्वारा रचे गए पात्र को समझकर उसे स्वाभाविक रूप से पर्दे पर उतारना चाहिए। नागपुर महानगरपालिका, श्री सिद्धिविनायक सेवा ट्रस्ट और विदर्भ गौरव प्रतिष्ठान की ओर से बुधवार को सिविल लाइंस स्थित डॉ. वसंतराव देशपांडे सभागृह में ‘दिलखुलास गप्पा’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। अभिनेता पुष्कर श्रोत्री ने अशोक सराफ से संवाद किया, जिसमें उनके लंबे कलाप्रवास की कई यादें और अभिनय से जुड़े अनुभव सामने आए। राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली भूमिका का अनुभव साझा करते हुए सराफ ने कहा कि उन्हें राजनीति की ज्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन उन्होंने किरदार के व्यवहार और परिस्थितियों को समझकर भूमिका निभाई। बाद में इसी भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला।

पात्र के सूक्ष्म पहलुओं को समझना जरूरी
सराफ ने कहा कि अभिनय में किसी पात्र को जीवंत बनाने के लिए उसके सूक्ष्म गुणों और व्यवहार को समझना जरूरी है। दुनिया में हर व्यक्ति का स्वभाव और व्यक्तित्व अलग होता है और यही अलग-अलग विशेषताएं किसी किरदार को वास्तविक बनाती हैं। यदि अभिनेता केवल बाहरी हावभाव या सतही अभिनय तक सीमित रहे तो पात्र जीवंत लगने के बजाय महज एक ‘ठोकळा’ यानी निर्जीव आकृति जैसा दिखाई दे सकता है। उन्होंने कहा कि भूमिका मिलने के बाद शुरुआत में वह कठिन लगना स्वाभाविक है, लेकिन अध्ययन, निरीक्षण और निरंतर प्रयास से वही भूमिका आसान हो जाती है। सैकड़ों नाटकों और प्रयोगों के बाद भी मंच पर पहली एंट्री के समय आज भी उन्हें कुछ घबराहट महसूस होती है। हालांकि मंच पर कदम रखते ही यह दबाव खत्म हो जाता है। उनके अनुसार शुरुआत की यह धाकधूक कलाकार के लिए जरूरी है, क्योंकि यही उसे अपने काम और भूमिका के प्रति सजग और ईमानदार बनाए रखती है।

गायन से जुड़ा किस्सा भी सुनाया
अपने गायन के अनुभव का दिलचस्प किस्सा साझा करते हुए अशोक सराफ ने बताया कि वे स्वयं को गायक नहीं मानते। दिवंगत संगीतकार आनंद मोडक ने उन्हें एक गीत गाने के लिए कहा था। शुरुआत में उन्होंने यह सोचकर इनकार कर दिया कि उनसे गाना खराब हो जाएगा। लेकिन मोडक ने उन्हें समझाया कि यह किसी गायक का नहीं, बल्कि एक अभिनेता का गीत है। गीत में छोटे बच्चे को खिलाते समय अभिनेता को अलग-अलग आवाजों और चेहरे के भावों के साथ प्रस्तुति देनी थी। यह दृष्टिकोण सराफ को पसंद आया और उन्होंने गीत गाया। उन्होंने कहा कि अभिनय में कलाकार को केवल संवाद बोलने के बजाय किरदार के भीतर उतरना पड़ता है। पात्र की मानसिकता, उसकी प्रतिक्रिया और उसके व्यवहार के छोटे-छोटे पहलुओं को समझना ही अभिनय को स्वाभाविक बनाता है।

काम कलाकार के हाथ में, फैसला दर्शकों के हाथ में
फिल्म की सफलता या असफलता कलाकार को कितना प्रभावित करती है, यह उसके काम के प्रति लगाव और ईमानदारी पर निर्भर करता है। सराफ ने कहा कि यदि कोई कलाकार पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करे और फिर भी फिल्म दर्शकों को पसंद न आए तो निराशा जरूर होती है। मन में यही आता है कि ‘यह लोगों को पसंद आना चाहिए था, लेकिन पसंद नहीं आया।’ हालांकि हर कलाकार असफलता को अलग तरह से लेता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कलाकार के हाथ में केवल अपनी भूमिका और मेहनत होती है, जबकि अंतिम फैसला दर्शकों का होता है। “हम जितना कर सकते हैं, उतना ही हमारे हाथ में है, बाकी बहुत कुछ लोगों पर निर्भर है,” यह बताते हुए उन्होंने दर्शकों के निर्णय को स्वीकार करने की बात कही। उनके इस बेबाक और अनुभवों से भरे संवाद को उपस्थित रसिकों ने उत्स्फूर्त प्रतिसाद दिया। अभिनय की ईमानदारी, किरदार का गहन अध्ययन और दर्शकों के निर्णय को स्वीकार करने की सोच से अशोक सराफ के लंबे कलाप्रवास की तस्वीर सामने आई।