आषाढ़ी वारी की तैयारियां तेज: माऊली की पालखी के मान के अश्व ‘हीरा’ और ‘मोती’ अंकली से आळंदी के लिए रवाना

    27-Jun-2026
Total Views |
- 300 किलोमीटर की यात्रा के साथ शुरू हुई परंपरा
- श्रद्धालुओं ने भावभीनी विदाई दी

Image Source:(Internet)

बेळगाव: आषाढ़ी वारी का पावन पर्व नजदीक आते ही महाराष्ट्र में भक्ति का माहौल बन गया है। "माऊली-माऊली" के जयघोष और टाल-मृदंग की मधुर ध्वनि के बीच शनिवार को बेळगाव जिले के अंकली गांव से संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालखी के मान के अश्व 'हीरा' और 'मोती' आळंदी के लिए रवाना हुए। श्रीमंत शितोळे सरकार परिवार की ओर से इन अश्वों का पारंपरिक विधि-विधान से पूजन किया गया। इसके बाद स्थानीय श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा, आरती और ओवाळणी कर अश्वों को भावभीनी विदाई दी। अंकली से आळंदी तक लगभग 300 किलोमीटर की इस यात्रा के बाद संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालखी आळंदी से पंढरपुर के लिए प्रस्थान करेगी। आषाढ़ी वारी की शुरुआत के साथ ही पूरे क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण देखने को मिल रहा है।

194 वर्षों से निभाई जा रही है शितोळे परिवार की गौरवशाली परंपरा
माऊली की पालखी से जुड़े इन मान के अश्वों की सेवा का गौरव बेळगाव के अंकली स्थित शितोळे परिवार को पिछले 194 वर्षों से प्राप्त है। बताया जाता है कि आषाढ़ी वारी के पालखी सोहले को विशेष स्वरूप देने वाले हैबतबाबा आरफळकर के समय से माऊली के अश्व और तंबू की जिम्मेदारी शितोळे परिवार को सौंपी गई थी। यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ निभाई जा रही है। वर्तमान में श्रीमंत ऊर्जितसिंह राजे शितोळे सरकार और उनके पुत्र महादजीराजे शितोळे सरकार इस धार्मिक दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं। अंकली स्थित राजवाड़े के अंबाबाई मंदिर में अश्वों और जरीपटके का विशेष पूजन किया गया। इस अवसर पर चिकोडी-सदलगा के विधायक गणेश हुक्केरी सहित वारकरी संप्रदाय के अनेक पदाधिकारी, संत सेवक और श्रद्धालु उपस्थित रहे। अश्वों के राजवाड़े से बाहर निकलते ही बड़ी संख्या में भक्तों ने दर्शन कर उनका स्वागत किया।

आठ प्रमुख पड़ावों से होकर आळंदी पहुंचेगी यात्रा

अंकली से शुरू हुई यह यात्रा कई महत्वपूर्ण पड़ावों से होकर गुजरेगी। 27 जून को पहला पड़ाव मिरज में होगा। इसके बाद 28 जून को सांगलवाड़ी राम मंदिर, 29 जून को ईश्वरपुर पेठ नाका, 30 जून को वाठारगांव, 1 जुलाई को भरतगांव, 2 जुलाई को भुईंज, 3 जुलाई को सारोळा और 4 जुलाई को शिंदेवाड़ी में रात्रि विश्राम किया जाएगा। 5 और 6 जुलाई को यह यात्रा पुणे पहुंचेगी, जहां से अश्व आळंदी की ओर आगे बढ़ेंगे। इस पूरे मार्ग में हजारों वारकरी और श्रद्धालु अश्वों के दर्शन कर उनका स्वागत करेंगे। अश्वों की सेवा और संचालन की जिम्मेदारी तुकाराम कोळी और अक्षय परीट निभाएंगे।

वारकरी परंपरा का प्रतीक है माऊली के अश्वों का प्रस्थान
महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा में माऊली की पालखी के मान के अश्वों का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। इन अश्वों का प्रस्थान केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, सेवा और समर्पण का प्रतीक है। आषाढ़ी वारी के दौरान लाखों श्रद्धालु संत ज्ञानेश्वर महाराज और भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए पैदल पंढरपुर पहुंचते हैं। ऐसे में हीरा और मोती का यह पारंपरिक सफर वारकरी संप्रदाय के लिए विशेष श्रद्धा का विषय होता है। हर वर्ष की तरह इस बार भी हजारों भक्त मार्ग में इन मान के अश्वों के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त करेंगे और "ज्ञानोबा-तुकाराम" तथा "माऊली-माऊली" के जयघोष से पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देंगे।