महाराष्ट्र में नए आरटीआई नियम लागू, पारदर्शिता और सूचना के अधिकार पर छिड़ी बहस

    19-Jun-2026
Total Views |
- सरकार ने जारी किए महाराष्ट्र आरटीआई नियम-2026

Image Source:(Internet)

मुंबई। महाराष्ट्र सरकार ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 के तहत सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया में व्यापक बदलाव करते हुए महाराष्ट्र आरटीआई नियम-2026 अधिसूचित कर दिए हैं। सरकार का दावा है कि नए नियमों का उद्देश्य प्रशासनिक कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी, व्यवस्थित और डिजिटल बनाना है। हालांकि, इन बदलावों को लेकर पारदर्शिता कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि नई व्यवस्था सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया को पहले की तुलना में अधिक जटिल और महंगी बना सकती है। नियमों में आवेदन प्रक्रिया, शुल्क संरचना, पहचान सत्यापन और अपील व्यवस्था सहित कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं, जिनका सीधा प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ेगा।

एक आवेदन में केवल एक विषय, बढ़ा शुल्क और पहचान पत्र अनिवार्य
नए नियमों के तहत अब एक आरटीआई आवेदन सामान्यतः केवल एक ही विषय से संबंधित होगा और आवेदन 150 शब्दों से अधिक का नहीं होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को अलग-अलग विषयों पर जानकारी चाहिए तो उसे अलग-अलग आवेदन दाखिल करने होंगे। इसके अलावा प्रत्येक आवेदक को भारतीय नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वयं प्रमाणित फोटो पहचान पत्र जमा करना अनिवार्य होगा। यदि आवेदन के साथ निर्धारित पहचान पत्र नहीं लगाया गया तो लोक सूचना अधिकारी (पीआईओ) उसे वापस कर सकता है। शुल्क संरचना में भी उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। आवेदन शुल्क 10 रुपये से बढ़ाकर 30 रुपये कर दिया गया है, जबकि दस्तावेजों की फोटोकॉपी, स्कैन कॉपी और डिजिटल प्रतियों के लिए शुल्क 2 रुपये प्रति पृष्ठ से बढ़ाकर 5 रुपये प्रति पृष्ठ कर दिया गया है। प्रथम अपील के लिए 50 रुपये और द्वितीय अपील के लिए 100 रुपये शुल्क निर्धारित किया गया है।

ऑनलाइन जानकारी के लिए अलग प्रमाणन नहीं, गोपनीयता प्रावधान भी सख्त
नियमों के अनुसार यदि कोई जानकारी पहले से ही सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध है, तो लोक सूचना अधिकारी उसके लिए अलग से प्रमाणित प्रति जारी करने के लिए बाध्य नहीं होगा। आवेदक को सीधे वेबसाइट से जानकारी प्राप्त करने के लिए कहा जा सकता है। इसी प्रकार, पहले दी जा चुकी जानकारी के लिए बार-बार किए गए आरटीआई आवेदनों को भी पूर्व में दिए गए उत्तर का संदर्भ देकर निपटाया जा सकेगा। नए नियमों में व्यक्तिगत जानकारी को रोकने के दायरे का भी विस्तार किया गया है। ऐसी जानकारी जो सार्वजनिक गतिविधि या जनहित से संबंधित नहीं है अथवा किसी व्यक्ति की निजता का अनावश्यक उल्लंघन कर सकती है, उसे देने से इनकार किया जा सकता है। ऐसे मामलों में बड़े जनहित को साबित करने की जिम्मेदारी आवेदक पर होगी।

डिजिटल व्यवस्था को बढ़ावा, लेकिन उठ रहे हैं कई सवाल
सरकार ने नियमों में डिजिटल प्रक्रियाओं को भी बढ़ावा दिया है। अब नोटिस, जवाब और सूचना ई-मेल या ऑनलाइन आरटीआई प्लेटफॉर्म के माध्यम से भेजी जा सकेगी तथा शुल्क का भुगतान यूपीआई सहित विभिन्न डिजिटल माध्यमों से किया जा सकेगा। राज्य सूचना आयोग की सुनवाई भी अब भौतिक उपस्थिति के अलावा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित की जा सकेगी। साथ ही, बिना पर्याप्त कारण बार-बार अनुपस्थित रहने वाले अपीलकर्ताओं की अपील खारिज करने का अधिकार आयोग को दिया गया है। दूसरी ओर, धारा-4 के तहत स्वप्रेरित सूचना प्रकटीकरण को मजबूत करते हुए सार्वजनिक कार्यालयों के प्रमुखों की जवाबदेही बढ़ाई गई है। हालांकि सरकार इन बदलावों को प्रशासनिक दक्षता और डिजिटलीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रही है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि बढ़ी हुई फीस, अतिरिक्त दस्तावेजी आवश्यकताएं और प्रक्रिया संबंधी प्रतिबंध सूचना के अधिकार की मूल भावना को प्रभावित कर सकते हैं।