‘गॉडजिला एल नीनो’ का असर! महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात में सामान्य से कम बारिश की आशंका

    13-Jun-2026
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नई दिल्ली। यूरोपीय संघ की कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) की नई जलवायु भविष्यवाणी ने भारत के मानसून को लेकर चिंता बढ़ा दी है। वैश्विक जलवायु मॉडल संकेत दे रहे हैं कि जुलाई से सितंबर के बीच देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार यदि प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति और मजबूत होती है, तो इसका सबसे अधिक असर पश्चिमी और मध्य भारत पर पड़ सकता है। गुजरात में उल्लेखनीय वर्षा घाटे की संभावना जताई गई है, जबकि महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों, विशेषकर कोंकण क्षेत्र, और गोवा में सामान्य से 100 से 200 मिमी तक कम बारिश दर्ज की जा सकती है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून में कमी का सीधा प्रभाव कृषि, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

क्या है ‘गॉडजिला एल नीनो’, क्यों बढ़ी वैज्ञानिकों की चिंता
एल नीनो एक ऐसी जलवायु घटना है जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के समुद्री सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर वैश्विक मौसम प्रणालियों पर पड़ता है और भारत में अक्सर कमजोर मानसून से इसका संबंध देखा गया है। वैज्ञानिक अत्यधिक शक्तिशाली एल नीनो घटनाओं को ‘गॉडजिला एल नीनो’ नाम देते हैं। जून 2026 के शुरुआती आंकड़ों से संकेत मिले हैं कि प्रशांत महासागर में तापमान तेजी से बढ़ रहा है, जिससे वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित हो सकता है और भारत तक पहुंचने वाली नमी युक्त मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं। भारतीय मौसम विभाग (IMD) भी जून से सितंबर के मानसून सीजन के दौरान सामान्य से 90-92 प्रतिशत वर्षा का अनुमान जता चुका है, जिसे सामान्य से कम श्रेणी में रखा गया है।

खेती, जलसंकट और महंगाई पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षा में कमी का सबसे अधिक प्रभाव खरीफ फसलों पर पड़ सकता है। धान, कपास, सोयाबीन, दलहन और तिलहन जैसी फसलें मानसूनी बारिश पर निर्भर रहती हैं। कम वर्षा से उत्पादन घट सकता है, लागत बढ़ सकती है और खाद्य महंगाई में भी वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा बांधों और जलाशयों में जल भंडारण प्रभावित होने से सिंचाई और पेयजल आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि दीर्घकालिक मौसम पूर्वानुमान समय के साथ बदल सकते हैं और इन्हें अंतिम भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने सरकारों और किसानों को जल संरक्षण, बेहतर सिंचाई प्रबंधन और सूखा-प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देने की सलाह दी है।