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एबी न्यूज़ नेटवर्क। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव संकेतित किया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को इस बार मुस्लिम वोट बैंक में बिखराव का भारी नुकसान उठाना पड़ा है, जबकि भाजपा ने शहरी और उपनगरीय क्षेत्रों में हिंदू वोटों के बड़े ध्रुवीकरण के साथ मजबूत बढ़त हासिल की है। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ और सीमाई सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, वहीं टीएमसी ने “बंगाली संस्कृति बचाने” और धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर चुनाव लड़ा। दोनों दलों ने बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और खानपान तक को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाया। भाजपा उम्मीदवारों द्वारा घर-घर जाकर मछली हाथ में लेकर प्रचार करना भी चर्चा का विषय बना रहा।
पहचान की राजनीति और क्षेत्रीय दलों का असर
इस चुनाव में पहचान आधारित राजनीति का प्रभाव साफ दिखाई दिया। मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधित्व और “सम्मान” के मुद्दे को लेकर कई छोटे और क्षेत्रीय दल मैदान में उतरे, जिससे टीएमसी का पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक बिखर गया। इन वोटों का सीधा फायदा भाजपा को नहीं मिला, बल्कि वे विभिन्न क्षेत्रीय दलों और कुछ कांग्रेस उम्मीदवारों के खाते में चले गए। इससे भाजपा को हिंदू वोटों को एकजुट करने का अवसर मिला। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा ने खासतौर पर शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में “सुरक्षा” और “घुसपैठ” जैसे मुद्दों के जरिए गैर-मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद किया। दूसरी ओर, टीएमसी क्षेत्रीय मुस्लिम दलों के उभार को रोकने में असफल रही।
एजेयूपी और आईएसएफ जैसे दलों ने बदला समीकरण
निलंबित टीएमसी नेता हुमायूं कबीर द्वारा गठित आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) ने कई सीटों पर चौंकाने वाला प्रदर्शन किया। कबीर ने रेजिनगर और नौदा सीटों पर क्रमशः 58,876 और 27,943 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की। वहीं, ऑल इंडिया सेक्युलर फ्रंट (AISF) के एमडी नवसाद सिद्दीकी भांगर सीट पर 28 हजार से अधिक वोटों की बढ़त बनाए हुए हैं। कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवार मोताब शेख और जुल्फिकार अली ने फरक्का और रानीनगर सीटों पर जीत हासिल की। सीपीएम समर्थित उम्मीदवार मुस्तफिजुर रहमान भी डोमकल सीट पर बढ़त बनाए हुए हैं। हुमायूं कबीर द्वारा मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की आधारशिला रखने का मुद्दा भी चुनाव के दौरान काफी विवादों में रहा, जिसके बाद टीएमसी ने उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया था।
वोट प्रतिशत ने बदलते राजनीतिक समीकरण दिखाए
भारतीय निर्वाचन आयोग के अनुसार भाजपा को 45.64 प्रतिशत वोट शेयर मिला है, जबकि टीएमसी 40.80 प्रतिशत पर सिमट गई। कांग्रेस और सीपीएम का वोट प्रतिशत क्रमशः 3.11 और 4.35 प्रतिशत रहा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह परिणाम टीएमसी की उस रणनीति की विफलता को दर्शाता है, जिसमें वह खुद को अल्पसंख्यकों की एकमात्र संरक्षक के रूप में पेश कर रही थी। मुस्लिम वोटों में बिखराव और भाजपा के पक्ष में हिंदू वोटों के एकजुट होने से राज्य की राजनीति का समीकरण पूरी तरह बदलता दिखाई दे रहा है। अब टीएमसी के सामने एक ओर भाजपा का मजबूत हिंदू वोट बैंक है, तो दूसरी ओर बंटा हुआ और असंतुष्ट अल्पसंख्यक मतदाता वर्ग।