
एबी न्यूज़ नेटवर्क। एक समय था जब सुबह की शुरुआत रेडियो जॉकी की आवाज से होती थी, ट्रैफिक में सफर करते लोगों का साथी एफएम रेडियो होता था और शहर की धड़कन उसके संगीत, चर्चाओं और कार्यक्रमों में सुनाई देती थी। लेकिन अब वही इंडस्ट्री अपने सबसे कठिन दौर से गुजरता दिखाई दे रहा है। एफएम रेडियो कंपनियों की सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक दबाव है। डिजिटल चैलेंज तो एक मुद्दा है ही लेकिन सरकारी पॉलिसी ने भी इस FM Industry को संकट में डाल दिया है।रेडियो संचालन के लिए कंपनियों को लाइसेंस शुल्क, स्पेक्ट्रम लागत और 18% जीएसटी जैसे कई वित्तीय भार उठाने पड़ते हैं। जिसमें सरकार की भूमिका सीधे तौर पर नीति निर्धारक (policy maker), नियामक (regulator) और राजस्व लेने वाली संस्था के रूप में सामने आती है। कुल राजस्व का बड़ा हिस्सा इन्हीं भुगतान में चला जाता है। FM Industry की स्थिति सिर्फ कंपनियों के फैसलों से नहीं, बल्कि सरकारी नियमों और बाजार के बदलावों दोनों से प्रभावित होती है। पिछले वर्षों में कंपनियों ने रेडियो लाइसेंस हासिल करने के लिए भारी बोली लगाई थी, लेकिन बदलते बाजार में उतनी आय नहीं हो पा रही है। ऐसे में कई कंपनियों के लिए संचालन जारी रखना मुश्किल होता जा रहा है।
पहले टीवी टुडे और अब HT Media
देश की प्रमुख मीडिया कंपनियों में शामिल HT Media द्वारा अपने कई एफएम रेडियो स्टेशनों को बंद करने और लाइसेंस वापस करने के फैसले ने पूरे मीडिया उद्योग का ध्यान खींचा है। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में संचालित रेडियो नशा, रेडियो वन और फीवर एफएम के बंद होने की खबर केवल एक कारोबारी निर्णय नहीं, बल्कि पारंपरिक रेडियो माध्यम के सामने खड़े आर्थिक और तकनीकी संकट का संकेत मानी जा रही है। विशेषज्ञ इसे निजी एफएम रेडियो उद्योग के भविष्य को लेकर एक गंभीर चेतावनी मान रहे हैं। इससे पहले TV Today Network भी रेडियो सर्विस बंद कर चुका है। Big FM पर भी दिवालिया होने के कारण कार्रवाई हो चुकी है। RED FM ने लाइसेंस सरेंडर करके मुंबई में Magic FM को बंद कर दिया है। इसक अलावा भी कई रेडियो कंपनियां अपने स्टेशन बंद कर चुकी हैं, जिस वजह से हजारों लोगों की नौकरियां भी चली गई थीं। बता दें कि DTH के अलावा FM रेडियो सेक्टर ही सरकार को लाइसेंस फीस देता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बदली आदतें
एफएम रेडियो के सामने दूसरी बड़ी चुनौती डिजिटल माध्यमों का तेज़ी से बढ़ता प्रभाव है। पहले जहां लोग संगीत और मनोरंजन के लिए रेडियो पर निर्भर थे, वहीं अब स्मार्टफोन आधारित स्ट्रीमिंग ऐप्स, पॉडकास्ट और डिजिटल ऑडियो प्लेटफॉर्म तेजी से लोकप्रिय हो चुके हैं। इसके अलावा कई स्मार्टफोन में एफएम रिसीवर सक्रिय नहीं होने से लोग इंटरनेट आधारित सेवाओं की ओर बढ़ रहे हैं। इससे रेडियो की पहुंच और उपयोग दोनों प्रभावित हुए हैं। उद्योग संगठन AROI के अनुसार मीडिया क्षेत्र में वृद्धि के बावजूद रेडियो राजस्व में गिरावट दर्ज की गई है। एफएम रेडियो का दौर पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन इसके अस्तित्व को बनाए रखने के लिए बदलाव जरूरी है। स्थानीय जुड़ाव, क्षेत्रीय भाषा और कम लागत में पहुंच आज भी रेडियो की ताकत हैं। हालांकि बदलते समय में डिजिटल एकीकरण, नई नीतियां और व्यवसाय मॉडल अपनाना अनिवार्य हो गया है। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि एफएम रेडियो फिर से अपनी आवाज बुलंद कर पाता है या डिजिटल युग में धीरे-धीरे पीछे छूट जाता है।
रेडियो इंडस्ट्री की मांग
इस चुनौती से उबरने के लिए रेडियो उद्योग लंबे समय से सरकार से कुछ महत्वपूर्ण सुधारों की मांग कर रहा है।
GST 18% से घटाकर 5% किया जाए
निजी FM चैनलों को समाचार प्रसारित करने की अनुमति मिले
लाइसेंस दोबारा महंगी नीलामी के बिना बढ़ाए जाए
मोबाइल में FM फीचर सक्रिय हो