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नई दिल्ली।
इलेक्शन (Elections) कमीशन ऑफ इंडिया ने राज्यसभा की 37 सीटों के लिए द्विवार्षिक चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। यह चुनाव 10 राज्यों में होने जा रहे हैं और मतदान 16 मार्च 2026 को कराया जाएगा। आयोग के अनुसार, चुनाव प्रक्रिया की औपचारिक शुरुआत 26 फरवरी को अधिसूचना जारी होने के साथ होगी। मतदान के बाद उसी दिन मतगणना भी पूरी कर ली जाएगी, जिससे परिणामों की घोषणा में देरी नहीं होगी। यह पूरा चुनावी कार्यक्रम नियमित संसदीय प्रक्रिया के तहत आयोजित किया जा रहा है, क्योंकि संबंधित सदस्यों का कार्यकाल अप्रैल में समाप्त हो रहा है। चुनावी कार्यक्रम घोषित होने के साथ ही राजनीतिक दलों ने संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मंथन तेज कर दिया है और राज्यों में राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने लगी हैं।
अप्रैल में समाप्त होगा सदस्यों का कार्यकाल
राज्यसभा के 37 मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त हो रहा है, जिसके चलते इन सीटों पर चुनाव कराए जा रहे हैं। संसदीय व्यवस्था के तहत उच्च सदन को भंग नहीं किया जाता, बल्कि हर दो वर्ष में लगभग एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं। यही कारण है कि यह प्रक्रिया नियमित अंतराल पर आयोजित होती है, जिससे संसद में निरंतरता बनी रहती है। यह व्यवस्था लोकसभा से अलग है, जिसे कार्यकाल पूरा होने पर भंग किया जाता है। इस बार जिन राज्यों में सीटें रिक्त हो रही हैं, वहां राजनीतिक समीकरणों के आधार पर कई स्थानों पर परिणाम पहले से अनुमानित माने जा रहे हैं, जबकि कुछ राज्यों में मुकाबला दिलचस्प रहने की संभावना है।
उम्मीदवार चयन और राजनीतिक रणनीति तेज
चुनाव की तारीख घोषित होते ही राजनीतिक दलों ने उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया तेज कर दी है। चूंकि राज्यसभा सदस्य सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते, बल्कि राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य मतदान करते हैं, इसलिए दलों के लिए विधानसभा में अपनी संख्या और सहयोगी दलों का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। कई राज्यों में बहुमत के आधार पर परिणाम लगभग तय माने जा रहे हैं, लेकिन जहां संख्या संतुलन में है, वहां रणनीतिक समर्थन और संभावित क्रॉस-वोटिंग चुनाव को रोचक बना सकती है। आने वाले दिनों में उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही राजनीतिक समीकरण और स्पष्ट होने की उम्मीद है।
मतदान प्रक्रिया और प्रतिनिधित्व की प्रणाली
राज्यसभा चुनावों में मतदान आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत एकल हस्तांतरणीय मत (Single Transferable Vote) पद्धति से होता है। इस प्रणाली का उद्देश्य विभिन्न दलों को उनकी विधानसभा में मौजूद ताकत के अनुपात में प्रतिनिधित्व देना है। मतदान और मतगणना एक ही दिन पूरी होने से चुनाव परिणाम तेजी से सामने आ जाते हैं, जिससे राजनीतिक अनिश्चितता कम होती है। संसदीय लोकतंत्र की निरंतरता बनाए रखने के लिए यह प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है और भारत की संसदीय परंपरा में इसकी विशेष भूमिका है। चुनाव के परिणाम आगामी संसदीय समीकरणों को भी प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए राजनीतिक दलों की नजरें इन सीटों पर टिकी हुई हैं।