अकोला में हाई-वोल्टेज सियासत! BJP को रोकने के लिए आंबेडकर के दर पर पहुंचे विपक्षी दल

    22-Jan-2026
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- मेयर चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज

Prakash AmbedkarImage Source:(Internet) 
एबी न्यूज़ नेटवर्क।
अकोला (Akola) नगर निगम में मेयर चुनाव से पहले राजनीति ने अचानक हाई-वोल्टेज मोड़ ले लिया है। सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए अब विपक्षी दल एकजुट होने की कोशिश में जुट गए हैं। इसी कड़ी में AIMIM, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों (अजित पवार व शरद पवार) के नेताओं ने वंचित बहुजन आघाडी के प्रमुख प्रकाश आंबेडकर से मुलाकात की। भाजपा के पास 38 सीटें हैं, जबकि बहुमत के लिए 41 पार्षदों की जरूरत है। ऐसे में मेयर चुनाव से पहले सियासी जोड़-तोड़ तेज हो गई है और आखिरी वक्त में बड़ा उलटफेर होने की संभावना जताई जा रही है।

कांग्रेस–वंचित की बंद कमरे में 45 मिनट तक बातचीत
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस विधायक साजिद खान पठान ने अकोला में प्रकाश अंबेडकर के आवास पर पहुंचकर वंचित बहुजन आघाड़ी का समर्थन मांगा। दोनों नेताओं के बीच बंद कमरे में करीब 45 मिनट तक चर्चा हुई। इस बैठक में AIMIM और एनसीपी के दोनों गुटों के नेता भी मौजूद थे। कांग्रेस, जिसके पास 21 पार्षद हैं, ने साफ कहा है कि उसे किसी पद की चाह नहीं है और उसका एकमात्र लक्ष्य भाजपा को सत्ता से रोकना है। कांग्रेस ने ठाकरे गुट की शिवसेना को भी एक अहम प्रस्ताव दिया है, ताकि गैर-भाजपा दल मिलकर नगर निगम में सरकार बना सकें। वहीं, भाजपा ने भी बहुमत जुटाने के लिए ठाकरे गुट की शिवसेना से संपर्क किया है, जिससे राजनीतिक सरगर्मी और बढ़ गई है।
 
किंगमेकर की भूमिका में वंचित और ठाकरे गुट
80 सदस्यीय अकोला नगर निगम में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। भाजपा 38 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि कांग्रेस के पास 21, उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना के पास 6 और वंचित बहुजन आघाड़ी के पास 5 पार्षद हैं। इसके अलावा AIMIM के 3, शरद पवार गुट की एनसीपी के 3, अजित पवार गुट की एनसीपी का 1, शिंदे गुट की शिवसेना का 1 और 2 निर्दलीय पार्षद हैं। ऐसे में वंचित बहुजन आघाड़ी और ठाकरे गुट ‘किंगमेकर’ की भूमिका में नजर आ रहे हैं। बैठक में शरद पवार गुट के नेता रफीक सिद्दीकी, AIMIM पदाधिकारी सैयद मोसिम और अजित पवार गुट के एकमात्र पार्षद पति फैयाज खान भी मौजूद थे। अब सबकी नजरें प्रकाश अंबेडकर के फैसले पर टिकी हैं, जो अकोला की सत्ता का रुख तय कर सकता है।