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नागपुर।
महाराष्ट्र में अंग प्रत्यारोपण (Organ transplant) को लेकर हालात चिंताजनक होते जा रहे हैं। संसद में पेश हुए नए आंकड़ों ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में राज्य में करीब 297 मरीजों की मौत सिर्फ इसलिए हो गई क्योंकि समय पर उन्हें प्रत्यारोपण के लिए अंग नहीं मिल पाए। राष्ट्रीय स्तर पर यह संख्या 2020 से 2024 के बीच 2,805 तक पहुंच गई, जो स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़ी खामियों को उजागर करती है। नागपुर में जारी शीतकालीन विधानसभा सत्र के दौरान यह मुद्दा जोरदार बहस का कारण बनने की संभावना है।
दिल्ली आगे, महाराष्ट्र अब भी इंतज़ार की कतार में
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, दिल्ली में सबसे ज्यादा अंग प्रत्यारोपण होते हैं। लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा लिविंग-रिलेटेड डोनर्स पर आधारित है, यानी परिवार के सदस्य ही दान करते हैं। इससे दिल्ली के मरीजों की प्रतीक्षा अवधि कम हो जाती है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों के मरीज राष्ट्रीय पूल पर निर्भर रहते हैं। नतीजतन, जीवित दाताओं का अभाव और मृत दाताओं की कम संख्या राज्य में लंबी इंतजार सूची और बढ़ती मौतों का कारण बन रही है।
नागपुर सत्र में उठेगी प्रणाली सुधार की मांग
विदर्भ की राजधानी नागपुर में चल रहे शीतकालीन सत्र में यह गंभीर मुद्दा सुर्खियों में रहने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि राज्य में *कैडेवरिक ऑर्गन डोनेशन* को बढ़ावा नहीं दिया गया और ट्रांसप्लांट सिस्टम में तकनीकी सुधार नहीं किए गए, तो यह संकट और गहराता जाएगा। विपक्ष और स्वास्थ्य विशेषज्ञ सरकार पर अंग दान जागरूकता अभियान तेज करने तथा राष्ट्रीय पूल से मिलने वाले अंगों के समान वितरण को लेकर सख्त नीति लागू करने का दबाव बना सकते हैं।