कल तान्हा पोला होगा २३५ वर्ष का

    02-Sep-2024
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- नागपुर में सबसे बड़ा लकड़ी का बैल भोंसले पैलेस में

Tanha Pola 
नागपुर।
शहर में पोला के बाद दूसरे दिन तन्हा पोला (Tanha Pola) भरने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इस साल लकड़ी के बैल (तान्हा) का पोला २३५ साल पूरे कर रहा है। भारत एक कृषि प्रधान देश है और भारत में हर जगह पोला को बैलों के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। पोला या तन्हा पोला के दूसरे दिन, बच्चे लकड़ी के बैलों का पोला मनाते हैं। यह पोला विदर्भ को छोड़कर कहीं भी नहीं मनाया जाता है। वर्ष १७८९ में द्वितीय श्रीमंत राजे रघुजी महाराज भोंसले ने इस उत्सव की शुरुआत की।
 
बच्चों को बैल का महत्व समझे इसके लिए तान्हा पोले की शुरुआत की। राजा रघुजी महाराज भोंसले (द्वितीय) ने लकड़ी के बैल मंगवाकर बच्चों में बाँट दिये। उन बैलों को जीवित बैल की तरह सजाया गया। आम का तोरण लगाकर जलेबी, फल, चॉकलेट, बिस्कुट आदि का तोरण बनाकर बैलों की पूजा की गई। पूजा समाप्त होने के बाद तोरण तोड़ा गया तथा हनुमान को नारियल फोड़ने के बाद हनुमान खिड़की के दर्शन कर महत्व समझे इसके लिए तान्हा पोले की शुरुआत की। राजा रघुजी महाराज भोंसले (द्वितीय) ने लकड़ी के बैल मंगवाकर बच्चों में बाँट दिये। उन बैलों को जीवित बैल की तरह सजाया गया।आम का तोरण लगाकर जलेबी, फल, चॉकलेट, बिस्कुट आदि का तोरण बनाकर बैलों की पूजा की गई। पूजा समाप्त होने के बाद तोरण तोड़ा गया तथा हनुमान को नारियल फोड़ने बच्चों को मिठाई, पैसे और पैसे बांटे। इस प्रथा को २३५ वर्ष पूरे हो रहे हैं।
 
राजे मुधोजी महाराज भोंसले ने इस प्रथा को आज भी जारी रखा है। सबसे बड़ा लकड़ी का बैल राजे मुधोजी महाराज भोसले के महल में है। भोंसले परिवार के पास आज भी इतना बड़ा बैल है। यह बेल मुधोजीराजे के निवास स्थान श्री भोसला पैलेस, महल, नागपुर में है। इन लकड़ी के बैल की ऊंचाई आठ फीट और लंबाई छह फीट है। इस वर्ष भी उसी परंपरा का पालन करते हुए राजा मुधोजी महाराज भोंसले कायम रखे हुए हैं।