2,000 रुपए से अधिक के UPI भुगतान पर 0.4% MDR का मामला, सुप्रीम कोर्ट ने नहीं लगाई रोक

    28-Sep-2026
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एबी न्यूज़ नेटवर्क। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) से 2,000 रुपए से अधिक के लेनदेन पर प्रस्तावित 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 28 सितंबर को फिलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) को नोटिस जारी किया है। तीनों पक्षों को याचिका पर अपना जवाब चार सप्ताह के भीतर दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। यह याचिका अंजन दत्ता ने दायर की है, जिसमें प्रस्तावित शुल्क के कानूनी आधार पर सवाल उठाते हुए इसे समानता और व्यापार के मौलिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बताया गया है। अदालत ने फिलहाल कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।
 
16 सितंबर की अधिसूचना को चुनौती
विवाद की शुरुआत 16 सितंबर को जारी अधिसूचना से हुई, जिसमें 2,000 रुपए से अधिक के UPI भुगतान पर 0.4% MDR प्रस्तावित किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस व्यवस्था को लागू करने से पहले पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया और जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन भी नहीं हुआ। याचिका में आशंका जताई गई है कि अतिरिक्त शुल्क का बोझ छोटे कारोबारियों पर पड़ सकता है और कुछ व्यापारी डिजिटल भुगतान के बजाय नकद लेनदेन को प्राथमिकता दे सकते हैं। इससे डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के प्रयासों पर भी असर पड़ने की बात कही गई है। वहीं, केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल वेंकटरमण ने अदालत को बताया कि UPI लेनदेन में भी डेबिट और क्रेडिट कार्ड की तरह संचालन संबंधी लागत होती है। उनके अनुसार, प्रस्तावित राशि सरकार की ओर से लगाया गया वैधानिक कर नहीं, बल्कि NPCI की सुविधा से संबंधित संस्थाओं के बीच होने वाला सेटलमेंट शुल्क है।
 
सरकार को नहीं मिलेगा शुल्क का हिस्सा
केंद्र की ओर से यह भी कहा गया कि प्रस्तावित व्यवस्था के तहत एकत्र होने वाली राशि में सरकार की कोई हिस्सेदारी नहीं होगी। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि व्यवस्था अभी लागू नहीं हुई है और 15 अक्टूबर इसका पहला महत्वपूर्ण चरण होगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि पेमेंट गेटवे के करीब 96% यूजर्स प्रस्तावित शुल्क से बाहर रहेंगे। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमल्या बागची ने प्रस्तावित वसूली के कानूनी आधार को लेकर सवाल उठाया और पूछा कि यदि यह शुल्क नहीं है तो इसकी प्रकृति क्या है तथा इसे वसूलने का अधिकार किस प्रावधान के तहत है। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि UPI के विस्तार के बाद काले धन से जुड़े लेनदेन में कमी आई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब केंद्र, RBI और NPCI को चार सप्ताह में अपना पक्ष रखना होगा। नोटिस जारी होना प्रस्तावित शुल्क की वैधता पर अदालत का अंतिम निर्णय नहीं है।