कागज पर 893 प्लॉट आरक्षित, खेल के मैदान सिर्फ 51 विकसित

    16-Sep-2026
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नागपुर में बढ़ता कांक्रीटीकरण और अतिक्रमण घटा रहा बच्चों के खेलने का स्थान

playgrounds 
नागपुर में तेजी से बढ़ते कांक्रीटीकरण, नई बस्तियों के विस्तार और बढ़ती आबादी के बीच बच्चों के लिए खुले मैदानों की उपलब्धता लगातार चुनौती बनती जा रही है। शहर में कई हिस्सों में मैदान मौजूद हैं, लेकिन नई कॉलोनियों और लेआउट में बच्चों के लिए अलग खेल मैदान (Playgrounds) का अभाव दिखाई देता है। वहीं, जहां मैदान हैं, वहां भी पार्किंग, सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनियां, व्यावसायिक गतिविधियां, कचरा और निर्माण सामग्री के ढेर तथा अतिक्रमण के कारण उनकी उपयोगिता प्रभावित हो रही है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि शहर में कितने मैदान दर्ज हैं, बल्कि यह है कि वास्तव में कितने मैदान बच्चों के खेलने के लिए सालभर उपलब्ध हैं।
 
893 में से सिर्फ 138 प्लॉट विकसित
आंकड़े स्थिति की गंभीरता को सामने रखते हैं। वर्ष 2000 की विकास योजना (Development Plan) में सार्वजनिक सुविधाओं के लिए 893 प्लॉट आरक्षित किए गए थे। इनमें से अब तक केवल 138 प्लॉट विकसित हो पाए हैं। विकसित किए गए इन प्लॉट में सिर्फ 51 को खेल मैदान के रूप में विकसित किया गया है। यानी ये 51 मैदान शहर में मौजूद कुल खेल मैदानों की संख्या नहीं हैं, बल्कि विकास योजना के तहत आरक्षित प्लॉट में से विकसित किए गए खेल मैदान हैं। वहीं 556 आरक्षित प्लॉट अब भी अविकसित हैं। एक सर्वे में 199 प्लॉट अतिक्रमण या अनधिकृत ‘गुंठेवारी’ नियमितीकरण से प्रभावित पाए गए। कार्यकर्ताओं का कहना है कि जमीन आरक्षित कर देने भर से बच्चों को सुविधा नहीं मिलती। समय पर उसका विकास और संबंधित एजेंसी को हस्तांतरण भी जरूरी है।
 
मैदान हैं, लेकिन खेलने के लिए कितने उपलब्ध?
शहर के मौजूदा मैदानों को लेकर भी लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। कई जगह खेल के मैदानों का इस्तेमाल सामाजिक कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों और अन्य आयोजनों के लिए किया जाता है, तो कुछ स्थानों पर पार्किंग के रूप में उपयोग होने से बच्चों के लिए उपलब्ध जगह कम हो जाती है। कहीं कचरा तो कहीं निर्माण सामग्री जमा होने से मैदान का बड़ा हिस्सा अनुपयोगी हो जाता है। नई बस्तियों में तो स्थिति और चुनौतीपूर्ण है, जहां खेल के लिए आरक्षित जमीन का विकास ही नहीं हुआ। ऐसे में जरूरत केवल नए मैदान बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा मैदानों को अतिक्रमण से बचाने, नियमित रखरखाव करने और उन्हें प्राथमिकता से खेल गतिविधियों के लिए उपलब्ध रखने की है। इसके लिए आरक्षित सभी प्लॉट का वास्तविक स्थिति के आधार पर दोबारा ऑडिट करने की मांग उठ रही है।
 
हिंदुस्तान कॉलोनी मामले में हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान
मैदानों की कमी का मुद्दा बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ तक भी पहुंच चुका है। जनवरी में हिंदुस्तान कॉलोनी में स्वतंत्र खेल मैदान नहीं होने संबंधी प्रकाशित रिपोर्ट का हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान (suo-motu cognisance) लेते हुए उसे जनहित याचिका (PIL) में बदल दिया। न्यायालय के समक्ष एमिकस क्यूरी अधिवक्ता एस. सान्याल ने बताया कि कई इलाकों में बच्चों के लिए मैदान उपलब्ध नहीं हैं और उन्हें सुरक्षा संबंधी जोखिम के बीच आंतरिक सड़कों पर खेलना पड़ता है। उन्होंने यह भी बताया कि कई हाउसिंग लेआउट के नक्शे ऐसे स्वीकृत हुए, जिनमें खेल मैदान के लिए जमीन आरक्षित नहीं थी। मामले में हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज की अध्यक्षता में टाउन प्लानिंग विशेषज्ञों को शामिल कर समिति बनाने का सुझाव दिया है। मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है।