- भाद्रपद में निकलता है जुलूस
- मारबत और बडग्या के जरिए बुराइयों का प्रतीकात्मक विरोध

नागपुर। नागपुर में सदियों पुरानी मारबत परंपरा एक बार फिर लोकसंस्कृति और सामाजिक जागरूकता का संदेश लेकर सड़कों पर नजर आई। शहर में मारबत उत्सव के दौरान हजारों नागरिक जुलूस में शामिल हुए। ढोल-नगाड़ों, पारंपरिक जयघोष और नारों के बीच निकले इन जुलूसों ने पूरे शहर में उत्सव का माहौल बना दिया। भाद्रपद माह में मनाया जाने वाला यह उत्सव नागपुर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है। इस दौरान विशाल पुतलों के रूप में तैयार की जाने वाली मारबतें बुराई और नकारात्मक शक्तियों का प्रतीक मानी जाती हैं। बांस, कागज और कपड़े जैसी सामग्री से तैयार इन पुतलों के माध्यम से समाज में मौजूद समस्याओं और समकालीन मुद्दों की ओर भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया जाता है।
मारबत के साथ बडग्या भी, जुलूस में गूंजते हैं सामाजिक संदेशउत्सव में बड़ी मारबतों के साथ छोटे प्रतीकात्मक पुतले ‘बडग्या’ भी जुलूस का हिस्सा बनते हैं। इन्हें समाज में मौजूद नकारात्मक प्रभावों और सामाजिक बुराइयों का प्रतीक माना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों से निकलने वाले जुलूस शहर के विभिन्न हिस्सों से गुजरते हैं, जहां बड़ी संख्या में नागरिक इन्हें देखने और उत्सव में शामिल होने के लिए पहुंचते हैं। इस दौरान पारंपरिक लोककला और संस्कृति के साथ सामाजिक मुद्दों को अभिव्यक्ति देने का अनूठा मेल दिखाई देता है। मारबत के जरिए हर वर्ष बदलते सामाजिक संदर्भों और बुराइयों पर व्यंग्य या संदेश देने की परंपरा इसे अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों से अलग पहचान देती है।
बुराई के अंत और अच्छाई की जीत का प्रतीक है दहनमारबत उत्सव का समापन पुतलों के प्रतीकात्मक दहन के साथ होता है। यह दहन समाज से नकारात्मकता और बुराइयों को दूर करने तथा अच्छाई की जीत का संदेश देता है। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा नागपुर के लोक इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। बदलते समय के साथ मारबत के स्वरूप और संदेश में भले ही बदलाव आया हो, लेकिन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाने की इसकी मूल भावना आज भी कायम है। यही वजह है कि मारबत उत्सव नागपुर में केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, जनअभिव्यक्ति और सामाजिक जागरूकता का अनूठा मंच बनकर सामने आता है।