'हमें कॉकरोच कहने के लिए धन्यवाद': धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अभिजीत दिपके का CJI के बयान पर बड़ा दावा

    25-Jul-2026
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- 'अगर कॉकरोच नहीं कहा होता तो यह आंदोलन शुरू ही नहीं होता'

Abhijit Dipke
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नई दिल्ली। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के कुछ ही मिनट बाद जंतर-मंतर पर मौजूद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने समर्थकों को संबोधित करते हुए आंदोलन की शुरुआत का श्रेय भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की एक टिप्पणी को दिया। दिपके ने मंच से कहा, "हमें कॉकरोच कहने के लिए धन्यवाद। मैं मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का आभार व्यक्त करना चाहता हूं। अगर उन्होंने हमें कॉकरोच नहीं कहा होता, तो मैं भारत नहीं आता और यह आंदोलन भी शुरू नहीं होता।" दिपके का कहना था कि एक टिप्पणी ने देशभर के युवाओं को एक मंच पर लाने का काम किया और बाद में यही आंदोलन NEET-UG पेपर लीक विवाद में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश की उस टिप्पणी पर बाद में स्पष्टीकरण भी सामने आया था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से शुरू हुआ विवाद
अभिजीत दिपके जिस टिप्पणी का जिक्र कर रहे थे, वह 15 मई को सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम से जुड़ी सुनवाई के दौरान की गई थी। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कथित तौर पर कहा था कि "कॉकरोच की तरह ऐसे युवा हैं जिन्हें रोजगार नहीं मिल रहा और पेशे में जगह नहीं है।" यह टिप्पणी तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। बाद में मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि उनका बयान बेरोजगार युवाओं के लिए नहीं, बल्कि फर्जी कानून की डिग्री रखने वाले लोगों के संदर्भ में था। उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया के कुछ हिस्सों ने उनकी टिप्पणी को गलत तरीके से प्रस्तुत किया। बावजूद इसके, यह टिप्पणी सार्वजनिक बहस का विषय बन गई और सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का कारण बनी।
व्यंग्य से आंदोलन तक का सफर
उस समय अमेरिका के बोस्टन में पढ़ाई कर रहे अभिजीत दिपके, जो पहले आम आदमी पार्टी में कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजिस्ट के रूप में भी काम कर चुके थे, ने इस टिप्पणी के अगले दिन सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया दी। 16 मई को उन्होंने "कॉकरोच जनता पार्टी" के गठन की घोषणा करते हुए इसे उन सभी युवाओं का मंच बताया जिन्हें व्यवस्था ने नजरअंदाज किया है। शुरुआत में यह एक व्यंग्यात्मक अभियान था, लेकिन मई के अंत तक NEET-UG पेपर लीक विवाद पर बढ़ते जनाक्रोश के बीच यह एक संगठित आंदोलन का रूप लेने लगा। जून की शुरुआत में डिपके भारत लौटे और जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व संभाल लिया। आंदोलन की प्रमुख मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की जवाबदेही तय करने और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार लागू करने की रही।
वांगचुक के जुड़ने से मिला बल
आंदोलन को नई गति तब मिली जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक 28 जून को जंतर-मंतर पहुंचे और छात्रों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। उनका अनशन 26 दिनों तक चला और केंद्र सरकार से लिखित आश्वासन मिलने के बाद समाप्त हुआ। आश्वासन में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई नहीं करने, परीक्षा सुधारों पर संसद में चर्चा और कथित पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने जैसे मुद्दों पर विचार का उल्लेख किया गया। इसके बावजूद CJP ने स्पष्ट किया था कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रहेगा। आखिरकार शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान ने छात्रों के हितों और देश में उत्पन्न परिस्थितियों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया। डिपके और उनके समर्थकों ने इसे आंदोलन की बड़ी सफलता बताया, जबकि उन्होंने यह भी कहा कि उनका अगला लक्ष्य परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्थायी शिक्षा सुधार सुनिश्चित करना है।