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नई दिल्ली। शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने सोमवार को सफदरजंग अस्पताल प्रशासन से उन्हें छुट्टी देने की अपील की। वांगचुक ने कहा कि उनकी स्वास्थ्य संबंधी सभी प्रमुख जांच सामान्य हैं और वह स्वयं को पूरी तरह स्वस्थ महसूस कर रहे हैं। उन्होंने अस्पताल प्रशासन को लिखे पत्र में आग्रह किया कि उन्हें कम से कम कुछ समय के लिए अस्पताल से बाहर जाने की अनुमति दी जाए ताकि वह कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके और अन्य आंदोलनकारियों के साथ आयोजित 'संसद चलो' मार्च में शामिल हो सकें। वांगचुक 21 दिनों की भूख हड़ताल के बाद 18 जुलाई को स्वास्थ्य बिगड़ने पर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराए गए थे। उन्होंने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर साझा पत्र में लिखा कि वह ठीक महसूस कर रहे हैं और उनके स्वास्थ्य मानक सामान्य हैं, इसलिए उन्हें लोकतांत्रिक आंदोलन में भाग लेने की अनुमति दी जानी चाहिए।
'संसद चलो' मार्च पर सुरक्षा सख्त
इधर, संसद के मानसून सत्र के पहले दिन जंतर-मंतर से संसद की ओर कूच करने की कोशिश कर रहे सीजेपी कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की। प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने के दौरान पुलिस ने हल्का लाठीचार्ज भी किया, जिससे कुछ समय के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। राजधानी के कई इलाकों में यातायात भी प्रभावित रहा। इस बीच सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास को पुलिस बातचीत के लिए उप पुलिस आयुक्त (डीसीपी) कार्यालय लेकर गई। बाहर आने के बाद उन्होंने कहा कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत जारी है और संगठन संवाद के लिए तैयार है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन की ओर से अब तक किसी ठोस समाधान या स्पष्ट प्रस्ताव की जानकारी नहीं दी गई है और अब आगे की पहल सरकार को करनी होगी।
गीतांजलि आंग्मो की अपील- आंदोलन शांतिपूर्ण रहे, मुद्दा शिक्षा ही बने
सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने भी प्रदर्शनकारियों से संयम बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि पूरे आंदोलन का केंद्र केवल शिक्षा सुधार होना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाया जाए। उन्होंने कहा कि आज तीन बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं—पहला, मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण रहे; दूसरा, आंदोलन का फोकस शिक्षा व्यवस्था की खामियों और परीक्षा प्रणाली में सुधार पर बना रहे; और तीसरा, सभी प्रदर्शनकारी सतर्क और अनुशासित रहें। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि देश के छात्रों और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
सरकार के सामने रखीं तीन शर्तें
सोनम वांगचुक ने दोहराया कि वह केवल आश्वासन नहीं बल्कि ठोस जवाबदेही चाहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि केंद्र सरकार शिक्षा व्यवस्था की हालिया विफलताओं, विशेषकर पेपर लीक जैसी घटनाओं की जिम्मेदारी स्वीकार करती है, या संसद के सदस्य मानसून सत्र में शिक्षा सुधार और जवाबदेही पर गंभीर चर्चा का भरोसा देते हैं, तो वह अपनी भूख हड़ताल समाप्त करने पर विचार करेंगे। वांगचुक का कहना है कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि देश की शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुधार सुनिश्चित करने के लिए है। दूसरी ओर, संसद सत्र के दौरान इस आंदोलन और उससे जुड़े घटनाक्रम पर सरकार तथा विपक्ष दोनों की नजर बनी हुई है, जिससे आने वाले दिनों में शिक्षा सुधार का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहने की संभावना है।