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नई दिल्ली। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में खुद को 'रिपोर्टर' बताने वालों की बढ़ती संख्या पर दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि केवल हाथ में मोबाइल फोन और माइक लेकर खुद को पत्रकार घोषित कर देना पत्रकारिता नहीं कहलाता। प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की मजबूत नींव है, लेकिन इसका इस्तेमाल गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग, दबाव बनाने या सामाजिक तनाव पैदा करने वाले व्यवहार की ढाल के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि डिजिटल मीडिया और स्वतंत्र (फ्रीलांस) रिपोर्टिंग के बढ़ते दायरे को देखते हुए ऐसा नियामक ढांचा जरूरी है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाए रखते हुए जवाबदेही और पत्रकारिता के नैतिक मानकों को भी सुनिश्चित करे।
'सवाल का जवाब देना नागरिक की मजबूरी नहीं'
न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया ने यह टिप्पणी सीमापुरी में 2025 में दर्ज एक मारपीट मामले में आरोपित आबिद अली और फुरकान की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की। मामला उस घटना से जुड़ा है, जिसमें खुद को यूट्यूब रिपोर्टर बताने वाले दो लोगों पर कथित तौर पर भीड़ ने हमला कर दिया था। वे अवैध निर्माण की वीडियो रिकॉर्डिंग करने का दावा कर रहे थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच अधिकारी के दावों और वीडियो साक्ष्यों में विरोधाभास पाया तथा जांच की गुणवत्ता पर नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि आज सोशल मीडिया ने किसी भी व्यक्ति को स्वयंभू रिपोर्टर बनने का अवसर दे दिया है। कई बार ऐसे लोग नागरिकों पर तत्काल प्रतिक्रिया देने का दबाव बनाते हैं और जवाब न मिलने पर उसे भ्रामक तरीके से पेश कर देते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक को सवालों का जवाब न देने का पूरा अधिकार है और उसकी चुप्पी को दोष स्वीकार करने या बचने की कोशिश के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।
जांच में खामियों पर फटकार
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि आरोपित लगभग एक वर्ष से न्यायिक हिरासत में थे, जबकि मुकदमे की सुनवाई अभी तक शुरू नहीं हुई थी। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष स्वयं आरोपितों की पहचान और भूमिका को लेकर स्पष्ट नहीं है, इसलिए उन्हें लगातार जेल में रखना उचित नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर आबिद अली और फुरकान को 10-10 हजार रुपये के निजी मुचलके पर नियमित जमानत दे दी गई। मामले के चार अन्य सह-आरोपितों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत आदेश में की गई टिप्पणियां केवल इस चरण तक सीमित हैं और इनका मुकदमे के अंतिम फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। साथ ही, अदालत ने दोहराया कि डिजिटल पत्रकारिता के विस्तार के साथ मीडिया की स्वतंत्रता और उसकी जवाबदेही के बीच संतुलन बनाए रखना समय की बड़ी आवश्यकता है।