20वें दिन सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल: बिगड़ती सेहत ने बढ़ाई चिंता, डॉक्टरों ने अंगों पर खतरे की जताई आशंका

    17-Jul-2026
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'अब बोल भी नहीं पा रहा हूं': आंदोलन के बीच भावुक हुए वांगचुक

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जलवायु कार्यकर्ता, इंजीनियर और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां आंदोलन से अधिक उनकी सेहत चिंता का विषय बन गई है। जंतर-मंतर पर जारी इस प्रदर्शन के 20वें दिन उनकी शारीरिक स्थिति काफी कमजोर हो गई है। 19वें दिन की शाम तक वांगचुक इतने अशक्त दिखाई दिए कि वे बिना सहारे बैठ भी नहीं पा रहे थे। मंच पर तकियों के सहारे लेटे वांगचुक ने समर्थकों से क्षमा मांगते हुए कहा, "मुझे माफ कीजिए, मैं बोल पाने की स्थिति में नहीं हूं।" उनका यह संदेश न केवल आंदोलन में शामिल लोगों बल्कि देशभर में उनके समर्थकों के लिए भावुक कर देने वाला क्षण बन गया। लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से संघर्ष कर रहे वांगचुक की गिरती सेहत अब आंदोलन के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर रही है।

20 दिनों में 9 किलो से अधिक वजन घटा, डॉक्टरों ने दी गंभीर चेतावनी
वांगचुक का स्वास्थ्य परीक्षण कर रहे चिकित्सकों के अनुसार, 28 जून को भूख हड़ताल शुरू करने के बाद से उनका वजन 9 किलोग्राम से अधिक घट चुका है। मेडिकल बुलेटिन के मुताबिक उनका वर्तमान वजन केवल 56.9 किलोग्राम रह गया है। डॉक्टरों का कहना है कि लगातार उपवास के कारण शरीर को आवश्यक पोषण नहीं मिल रहा, जिससे कमजोरी तेजी से बढ़ रही है। चिकित्सकों ने चेतावनी दी है कि यदि यह स्थिति अधिक समय तक बनी रही तो शरीर के महत्वपूर्ण अंगों—जैसे हृदय, किडनी और लीवर—की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। डॉक्टरों ने इसे गंभीर चिकित्सीय स्थिति बताते हुए लगातार निगरानी की आवश्यकता जताई है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक भूखे रहने से शरीर की ऊर्जा समाप्त होने लगती है और इसके परिणाम जानलेवा भी हो सकते हैं।

मांगों को लेकर अडिग वांगचुक, समर्थकों में बढ़ी चिंता

हालांकि स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है, लेकिन वांगचुक अब भी अपनी मांगों से पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहे हैं। जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में समर्थक उनके साथ मौजूद हैं और सरकार से उनकी मांगों पर सकारात्मक पहल करने की अपील कर रहे हैं। आंदोलन के दौरान वांगचुक ने हमेशा अहिंसक और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने पर जोर दिया है। लेकिन अब चर्चा आंदोलन के मुद्दों से आगे बढ़कर उनकी जान पर मंडराते खतरे पर केंद्रित होती जा रही है। सोशल मीडिया पर भी उनकी सेहत को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है और कई लोग सरकार से जल्द समाधान निकालने की मांग कर रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद के माध्यम से समाधान तलाशना आवश्यक है।

स्वास्थ्य संकट के बीच बढ़ा दबाव, नजरें अगले कदम पर
वांगचुक की बिगड़ती स्थिति ने इस आंदोलन को नया मोड़ दे दिया है। जहां एक ओर उनके समर्थक इसे अपने संघर्ष की मजबूती के रूप में देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चिकित्सकीय चेतावनियां इस आंदोलन की गंभीरता को और बढ़ा रही हैं। यदि जल्द कोई समाधान नहीं निकलता, तो यह केवल एक राजनीतिक या सामाजिक मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा बड़ा संकट बन सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और आंदोलनकारी पक्ष के बीच बातचीत की कोई पहल होती है या नहीं। साथ ही डॉक्टर लगातार उनकी सेहत पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि आने वाले दिन उनके स्वास्थ्य और आंदोलन—दोनों के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।