मानसून सत्र से पहले 'मिशन 360' पर NDA का फोकस! फिर सदन में आएगा कॉन्स्टिट्यूएंसी रीऑर्गेनाइजेशन बिल

    17-Jul-2026
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एबी न्यूज़ नेटवर्क। संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। ऐसे में केंद्र सरकार एक बार फिर कॉन्स्टिट्यूशन (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 यानी कॉन्स्टिट्यूएंसी रीऑर्गेनाइजेशन बिल को पारित कराने की तैयारी में है। यह वही विधेयक है जो अप्रैल 2026 के बजट सत्र में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण 54 वोटों से पारित नहीं हो पाया था। लेकिन बीते तीन महीनों में लोकसभा का राजनीतिक गणित तेजी से बदला है और इसी बदलाव के बीच सरकार ने 'मिशन 360' की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। दूसरी ओर, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सभी विपक्षी दलों की बैठक बुलाने की मांग की है। उनका कहना है कि विधेयक का अंतिम मसौदा सामने आए बिना विपक्ष कोई सामूहिक निर्णय नहीं ले सकता। ऐसे में मानसून सत्र केवल विधायी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक रणनीति की भी बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।

850 सीटों का प्रस्ताव और महिला आरक्षण से जुड़ा है विधेयक

कॉन्स्टिट्यूएंसी रीऑर्गेनाइजेशन बिल के दो प्रमुख प्रावधान हैं। पहला, लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करना और दूसरा, परिसीमन (डीलिमिटेशन) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम से जोड़ा गया है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार लोकसभा सीटों का निर्धारण राज्यों की जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा। यही कारण है कि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भारतीय राज्य इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। इन राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, इसलिए केवल आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कम कर सकता है। इस मुद्दे ने संघीय ढांचे, क्षेत्रीय संतुलन और प्रतिनिधित्व को लेकर नई बहस भी छेड़ दी है।

बजट सत्र में 54 वोटों से अटका था बिल, अब बदला है संसद का गणित

17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में इस विधेयक पर मतदान हुआ था। उस समय 528 सांसदों ने वोट डाला था और संवैधानिक संशोधन पारित करने के लिए 352 मतों की आवश्यकता थी। सरकार के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने विरोध में मतदान किया, जिससे विधेयक 54 वोटों से पारित होने से चूक गया। उस समय कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, शिवसेना (यूबीटी), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट), समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल समेत विपक्षी दल एकजुट होकर सरकार के खिलाफ खड़े हुए थे। हालांकि, इसके बाद संसद में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले हैं। विभिन्न विपक्षी दलों के 37 सांसदों के एनडीए के समर्थन में आने से सत्तापक्ष की संख्या 292 से बढ़कर 329 हो गई है। फिलहाल लोकसभा की तीन सीटें रिक्त होने के कारण दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 360 माना जा रहा है और एनडीए अब इस लक्ष्य से केवल 31 वोट दूर है।

क्षेत्रीय दलों पर नजर, क्या मानसून सत्र में पार हो जाएगा '360' का आंकड़ा?

सरकार ने आवश्यक समर्थन जुटाने के लिए 'मिशन 360' के तहत क्षेत्रीय दलों के साथ संवाद तेज कर दिया है। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, यदि केंद्र सरकार सभी राज्यों में लगभग 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने की स्पष्ट गारंटी देती है तो डीएमके अपने रुख पर पुनर्विचार कर सकती है। इसी तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले ने भी संकेत दिए हैं कि राज्यों के हितों को लेकर लिखित आश्वासन मिलने पर पार्टी समर्थन पर विचार कर सकती है। वहीं शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने भी कहा है कि यदि विपक्ष के सुझाए गए संशोधनों को स्वीकार किया जाता है तो पार्टी अपने रुख की समीक्षा कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि डीएमके और एनसीपी (शरद पवार गुट) जैसे दल समर्थन देते हैं, तो एनडीए का आंकड़ा बहुमत की आवश्यक सीमा के बेहद करीब पहुंच सकता है। ऐसे में मानसून सत्र केवल एक विधेयक पर मतदान नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की संसदीय राजनीति और शक्ति संतुलन की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।