- पूर्वी बेड़े में शामिल हुआ स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट
- आत्मनिर्भर भारत को मिली नई मजबूती

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विशाखापत्तनम। भारतीय नौसेना की सामरिक क्षमता को शनिवार को नई मजबूती मिली, जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्वदेशी तकनीक से निर्मित प्रोजेक्ट-17ए के छठे स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस महेंद्रगिरि को औपचारिक रूप से भारतीय नौसेना के पूर्वी बेड़े (ईस्टर्न फ्लीट) में शामिल किया। नौसैनिक डॉकयार्ड में आयोजित इस समारोह में नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों और अनेक गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति रही। इस अवसर पर रक्षा मंत्री ने कहा कि आईएनएस महेंद्रगिरि का नौसेना में शामिल होना भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता और स्वदेशी युद्धपोत निर्माण क्षमता की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने मजगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल), भारतीय नौसेना, युद्धपोत के चालक दल और देशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि यह युद्धपोत भारत की बढ़ती रक्षा विनिर्माण क्षमता और 'आत्मनिर्भर भारत' के संकल्प का सशक्त प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भारत अब केवल अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भी अपनी मजबूत पहचान बना रहा है।
हवा, समुद्र और पनडुब्बियों से एक साथ मुकाबला करने में सक्षम
करीब 6,670 टन के पूर्ण भार विस्थापन और 28 नॉट्स की अधिकतम गति वाला आईएनएस महेंद्रगिरि एक अत्याधुनिक बहु-भूमिका (मल्टी-मिशन) स्टील्थ फ्रिगेट है। इसे समुद्र में हर प्रकार के सैन्य अभियान को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए तैयार किया गया है। इस युद्धपोत में उन्नत स्टील्थ तकनीक, कम रडार सिग्नेचर, बेहतर सर्वाइवल क्षमता और उच्च स्तर की ऑटोमेशन जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह युद्धपोत हवा में मौजूद खतरों, समुद्र की सतह पर दुश्मन के जहाजों और समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बियों से एक साथ प्रभावी ढंग से मुकाबला कर सकता है। उन्होंने इसे "ब्लू-वॉटर वारशिप" बताते हुए कहा कि यह केवल भारतीय तटीय क्षेत्रों की ही नहीं, बल्कि दूरस्थ और गहरे समुद्री इलाकों में भी कई सप्ताह तक लगातार तैनात रहकर भारत के समुद्री हितों की रक्षा करने में सक्षम है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता और रणनीतिक उपस्थिति और अधिक मजबूत होगी।
ब्रह्मोस सहित आधुनिक हथियारों और स्वदेशी तकनीक से लैस
आईएनएस महेंद्रगिरि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री और तकनीक का उपयोग किया गया है, जो भारत की डिजाइन क्षमता और रक्षा उद्योग की बढ़ती ताकत को दर्शाता है। इस युद्धपोत को दुनिया की सबसे तेज और घातक क्रूज मिसाइलों में शामिल ब्रह्मोस सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल से लैस किया जा सकता है। इसके अलावा इसमें मल्टी-फंक्शन रडार, लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली, स्वदेशी रॉकेट लॉन्चर, टॉरपीडो लॉन्चर, एकीकृत पनडुब्बी रोधी रक्षा प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और क्लोज-इन वेपन सिस्टम जैसे अत्याधुनिक हथियार और उपकरण लगाए गए हैं। यह युद्धपोत एंटी-एयर, एंटी-सर्फेस और एंटी-सबमरीन ऑपरेशन के अलावा समुद्री सुरक्षा, खोज एवं बचाव अभियान, मानवीय सहायता, आपदा राहत और लंबी अवधि की समुद्री तैनाती जैसे विभिन्न मिशनों को भी प्रभावी ढंग से अंजाम देने में सक्षम है।
महेंद्रगिरि पर्वतमाला के नाम पर रखा गया नाम
इस युद्धपोत का नाम पूर्वी घाट की महेंद्रगिरि पर्वतमाला के नाम पर रखा गया है और यह भारतीय नौसेना का पहला पोत है जिसे यह नाम दिया गया है। इसके प्रतीक चिह्न (क्रेस्ट) में महेंद्रगिरि पर्वत के ऊपर बैठे एक बाज़ (गॉशहॉक) को दर्शाया गया है, जो तेज दृष्टि, धैर्य और निर्णायक कार्रवाई का प्रतीक माना जाता है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि यही गुण एक आधुनिक युद्धपोत में अपेक्षित होते हैं। उन्होंने कहा कि आईएनएस महेंद्रगिरि के नौसेना में शामिल होने से भारतीय नौसेना की युद्ध क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और यह भारत को स्वदेशी युद्धपोत निर्माण के क्षेत्र में अग्रणी देशों की श्रेणी में और मजबूत करेगा। साथ ही यह हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका को एक विश्वसनीय सुरक्षा साझेदार के रूप में सुदृढ़ करेगा तथा सुरक्षित, स्थिर और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र (इंडो-पैसिफिक) के निर्माण में भारत के योगदान को नई गति प्रदान करेगा।