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नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान कानूनी और संवैधानिक महत्व देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल के हालिया निर्णय के बाद देशभर में राष्ट्रीय प्रतीकों, पहचान और संवैधानिक मूल्यों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। खास बात यह है कि यह फैसला ऐसे समय आया है जब ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं। प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी ने इस गीत की रचना वर्ष 1875 में की थी, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान करोड़ों भारतीयों में देशभक्ति की भावना जगाने का कार्य किया। वहीं, राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की रचना नोबेल पुरस्कार विजेता रबीन्द्रनाथ टैगोर ने की थी। अब सरकार दोनों राष्ट्रीय प्रतीकों को समान सम्मान और कानूनी सुरक्षा देने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
कानून में संशोधन की तैयारी
भारत के गणराज्य बनने के बाद वर्ष 1950 में ‘जन गण मन’ को आधिकारिक रूप से राष्ट्रगान घोषित किया गया था, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला। हालांकि दोनों को सम्मान की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता रहा, लेकिन कानूनी स्तर पर दोनों की स्थिति अलग रही। वर्तमान में Prevention of Insults to National Honour Act के तहत राष्ट्रगान के अपमान या उसके दौरान व्यवधान उत्पन्न करने पर दंड का प्रावधान है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ के लिए ऐसा स्पष्ट कानूनी संरक्षण उपलब्ध नहीं था। अब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस कानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा है, ताकि ‘वंदे मातरम्’ को भी वही सुरक्षा और सम्मान मिल सके जो राष्ट्रगान को प्राप्त है। यदि यह संशोधन लागू होता है, तो राष्ट्रीय गीत के दौरान अपमानजनक व्यवहार या व्यवधान पैदा करने पर कानूनी कार्रवाई संभव होगी।
क्या माना जाएगा अपमान?
प्रस्तावित कानूनी ढांचे के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ के गायन के दौरान जानबूझकर व्यवधान डालना दंडनीय माना जा सकता है। इसमें नारेबाजी करना, शोर मचाना, प्रदर्शन करना या कार्यक्रम को बाधित करना शामिल हो सकता है। इसके अलावा गीत के शब्दों का मजाक उड़ाना, व्यंग्यात्मक रूप में प्रस्तुत करना या आधिकारिक समारोहों में अनादर दिखाना भी अपराध की श्रेणी में आ सकता है। स्कूलों की प्रार्थना सभाओं, सरकारी कार्यक्रमों और आधिकारिक आयोजनों में गीत के दौरान अनुचित व्यवहार पर भी कार्रवाई की संभावना जताई गई है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालतें पहले भी यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि नागरिकों से सम्मान की अपेक्षा की जा सकती है, लेकिन उन्हें गीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
तीन साल तक की सजा का प्रावधान संभव
यदि ‘वंदे मातरम्’ को औपचारिक रूप से राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम के दायरे में शामिल किया जाता है, तो इसके अपमान से जुड़े मामलों में तीन वर्ष तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान लागू हो सकता है। यह वही दंड व्यवस्था होगी जो वर्तमान में राष्ट्रगान से जुड़े अपराधों पर लागू होती है। सरकार के इस कदम को ‘वंदे मातरम्’ को केवल भावनात्मक और ऐतिहासिक प्रतीक से आगे बढ़ाकर एक कानूनी रूप से संरक्षित राष्ट्रीय प्रतीक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन की पहचान रहे इस गीत की 150 वर्ष की यात्रा अब एक नए संवैधानिक अध्याय की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।