नागपुर। रंग-बिरंगी कारीगरी, हाथों की बारीक नक्काशी और परंपरा की खुशबू से सजा मृगनयनी मध्यप्रदेश हस्तशिल्प प्रदर्शनी इन दिनों आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। “एक जिला एक उत्पाद” की थीम पर आधारित इस मेले में प्रदेशभर से आए नामचीन कलाकार अपनी अनूठी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। खासतौर पर चंदेरी शिल्प को प्रमुखता दी गई है, जहां छोटे-बड़े मिलाकर 12 से अधिक कलाकार अपनी कृतियों के साथ उपस्थित हैं। महिला कलाकार नाजनीन और शगुफ्ता ने भी अपनी भागीदारी दर्ज कराते हुए हस्तनिर्मित वस्त्रों की सुंदरता को प्रदर्शित किया। मो. रज़ा द्वारा 1930 रिवाइवल कलेक्शन और अनीस अंसारी की पांचवीं पीढ़ी द्वारा लाई गई जुगनी बूटी व चंदेरी पर मीनाकारी दर्शकों को विशेष आकर्षित कर रही है। यह आयोजन सीताबर्डी स्थित विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन मोर भवन के परिसर में किया जा गया है। मध्यप्रदेश हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम द्वारा 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' के तहत यह प्रदर्शनी 19 मार्च तक दोपहर 12 बजे से रात 9 बजे तक आयोजित होगी।
कलाकारों को मंच, संस्कृति से साक्षात्कार
इस संबंध में जानकारी देते हुए प्रभारी अरविंद शर्मा बताते हैं कि प्रदर्शनी में बाघ प्रिंट के मो. यूनुस द्वारा वनस्पति रंगों से तैयार कपड़े, मो. इकबाल का बैटिक प्रिंट, सुफियान अली की पंजा दरी और बुधनी-सिहोर के सुजान शर्मा व मुकेश विश्वकर्मा के खिलौने भी लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। जरी के बटुए और अन्य पारंपरिक उत्पाद भी प्रदर्शनी की शोभा बढ़ा रहे हैं। इस आयोजन का उद्देश्य कलाकारों को व्यापार का मंच प्रदान करना और आम लोगों को गुणवत्तापूर्ण हस्तशिल्प सामग्री उपलब्ध कराना है। प्रशासन द्वारा बुनकर-शिल्पियों की कार्यशालाएं आयोजित कर हथकरघा कला को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि लोग अपनी संस्कृति से रूबरू हो सकें।
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता मो. रज़ा चंदेरी की जुटिया काम करते हैं। इन पर काजल का टीका लगाया जाता है, जिससे नजर नहीं लगती और आकर्षण बना रहता है।
मंडला की महिला बुनकर पारंपरिक करघों पर उत्कृष्ट वस्त्र तैयार करती हैं। उनके हस्तनिर्मित कपड़े स्थानीय संस्कृति, मेहनत और बारीक कारीगरी का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
रजनी और संतोष धुर्वे गोंड कला के विशेषज्ञ हैं। यह जनजातीय शिल्प मध्यप्रदेश की पहचान है, जो स्मारकों और दीवारों की सुंदरता को बढ़ाता है।
जबलपुर के कृष्णकांत शुक्ला तुलसी की माला बनाते हैं। यह धार्मिक महत्व के साथ स्वास्थ्यवर्धक भी मानी जाती है और भक्ति भावना को मजबूत करती है। इनकी बनाई तुलसी माला प्राकृतिक लकड़ी से तैयार होती है। यह मन को शांति देती है और आध्यात्मिक साधना में विशेष सहायक मानी जाती है।
सुजान शर्मा प्राकृतिक रंगों से लकड़ी की डुगडुगी बनाते हैं। यह पारंपरिक खिलौना बच्चों में लोकप्रिय है और भारतीय लोक संस्कृति की झलक प्रस्तुत करता है।
चित्रा राव की मीनाकारी कला धातुओं पर रंगीन डिजाइन बनाती है। यह शिल्प बारीकी और सुंदरता का अद्भुत संगम है, जो आभूषणों में आकर्षण जोड़ता है।
तेज बहादुर खंडा वारली कला और मार्बल प्रिंट में दक्ष हैं। उनके डिजाइन आदिवासी जीवन और आधुनिक तकनीक का अनोखा मेल दर्शाते हैं।
भोपाल के विजय कुमार पारंपरिक ब्लॉक प्रिंटिंग करते हैं। लकड़ी के ब्लॉकों से कपड़ों पर छपाई कर वे आकर्षक और टिकाऊ डिजाइन तैयार करते हैं।
नाजनीन बैटिक प्रिंट में माहिर हैं। मोम और रंगों की तकनीक से कपड़ों पर अनोखे पैटर्न बनाकर वे फैशन और परंपरा का सुंदर मिश्रण प्रस्तुत करती हैं।
अब्दुल अज़ीम चंदेरी वस्त्रों के प्रसिद्ध कारीगर हैं। उनके बनाए हल्के और पारदर्शी कपड़े अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता और पारंपरिक डिज़ाइन के लिए जाने जाते हैं।
सुफियान अली द्वारा बनाई ऊनी दरी राष्ट्रपति भवन तक बिछाई गई है। यह मजबूत, आकर्षक और पारंपरिक बुनाई का शानदार उदाहरण है।
हसीना खातून फर्म महेश्वरी बाघ प्रिंट में कार्यरत हैं। उनके डिजाइन पारंपरिक पैटर्न और प्राकृतिक रंगों से तैयार होकर कपड़ों को विशेष पहचान देते हैं।
दीपक मराठे मलेसिया खादी बनाते हैं। यह हस्तनिर्मित कपड़ा प्राकृतिक और आरामदायक होता है, जो स्वदेशी परंपरा और सादगी का प्रतीक है।
छत्रपाल राजपूत बाघ प्रिंट के विशेषज्ञ हैं। यह ऐतिहासिक कला 12 जड़ी-बूटियों से बनती है और इसके पहनने से स्वास्थ्य संबंधी कई लाभ माने जाते हैं।
मंदसौर के खिलचीपुरा क्षेत्र की चादरें प्रसिद्ध हैं। ये पारंपरिक करघों पर बनाई जाती हैं, जिनमें टिकाऊपन, आकर्षक डिज़ाइन और स्थानीय कला की झलक मिलती है।