ग्रीन पटाखों से मनेगी प्रदूषण कम करने वाली दिवाली, लेकिन पूरी तरह प्रदूषण मुक्त नहीं

    04-Nov-2026
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- पारंपरिक पटाखों से अलग है इनकी रासायनिक संरचना
- दिल्ली-एनसीआर में 7 और 8 नवंबर को तय समय में ही फोड़ने की अनुमति

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नागपुर।
दिवाली पर आतिशबाजी और रंग-बिरंगी रोशनी के बीच पटाखों से निकलने वाला धुआं और हानिकारक गैसें हर साल वायु प्रदूषण बढ़ाती हैं। खासतौर पर दिल्ली-एनसीआर में त्योहार के बाद हवा की गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने और लोगों को सीमित रूप से आतिशबाजी की अनुमति देने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में 7 और 8 नवंबर को प्रमाणित ग्रीन पटाखे फोड़ने की अनुमति दी है। न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ के आदेश के अनुसार, 7 नवंबर को नरक चतुर्दशी और 8 नवंबर को दिवाली के दिन सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे तक ही पटाखे फोड़े जा सकेंगे। 9 नवंबर से फिर पटाखों पर प्रतिबंध लागू हो जाएगा। कोर्ट ने यह भी माना कि पहले लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद पारंपरिक पटाखों की बिक्री और उपयोग पर प्रभावी रोक नहीं लग सकी थी। ऐसे में नियंत्रित अनुमति के जरिए अवैध बिक्री और इस्तेमाल पर अंकुश लगाने की कोशिश की गई है।

पारंपरिक पटाखों से कैसे अलग हैं ग्रीन क्रैकर्स?
ग्रीन पटाखे पारंपरिक आतिशबाजी का ऐसा विकल्प हैं, जिन्हें जलाने पर अपेक्षाकृत कम प्रदूषण फैलाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। इनके विकास में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की भूमिका रही है। इनकी रासायनिक संरचना में बदलाव कर हानिकारक उत्सर्जन और राख की मात्रा कम करने का प्रयास किया जाता है। पारंपरिक पटाखों में पोटैशियम नाइट्रेट, सल्फर और बेरियम जैसे रासायनिक तत्वों का इस्तेमाल हो सकता है। इनके जलने से सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पीएम 2.5 व पीएम 10 जैसे सूक्ष्म कण निकलते हैं, जो हवा को प्रदूषित करते हैं और सांस संबंधी समस्याएं बढ़ा सकते हैं। इसके विपरीत ग्रीन पटाखों में कुछ हानिकारक रसायनों, विशेषकर बेरियम यौगिकों को हटाकर या उनकी जगह वैकल्पिक पदार्थों का उपयोग कर उत्सर्जन घटाने का प्रयास किया जाता है। इनके छोटे आकार और संशोधित रासायनिक मिश्रण से धुआं, राख और कणों का उत्सर्जन तुलनात्मक रूप से कम हो सकता है।

जिओलाइट और आयरन ऑक्साइड की अहम भूमिका
कुछ ग्रीन पटाखों में जिओलाइट और आयरन ऑक्साइड जैसे पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। जिओलाइट एक प्राकृतिक छिद्रयुक्त खनिज है, जो नमी और सूक्ष्म कणों को अपने भीतर रोकने की क्षमता रखता है। कुछ विशेष फॉर्मूलेशन में इसका उपयोग जलने के दौरान पैदा होने वाली धूल के कणों को वातावरण में फैलने से रोकने के लिए किया जाता है। वहीं, आयरन ऑक्साइड उत्प्रेरक के रूप में काम करता है और दहन प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है। इससे अधूरे दहन के कारण बनने वाले धुएं को कम करने का प्रयास किया जाता है। अलग-अलग फॉर्मूलेशन और परीक्षण मानकों के आधार पर ग्रीन पटाखों से प्रदूषक उत्सर्जन में करीब 30 प्रतिशत तक कमी का दावा किया जाता है। इनके शोर का स्तर और जलने की अवधि भी पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम रखने का प्रयास किया जाता है। हालांकि, इन्हें पूरी तरह प्रदूषण मुक्त समझना गलत होगा। ये केवल प्रदूषण कम करने वाला विकल्प हैं।

निर्माण और बिक्री के लिए तय किए गए नियम
ग्रीन पटाखों के नाम पर सामान्य पटाखों की बिक्री रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्माताओं और विक्रेताओं पर सख्त शर्तें लगाई हैं। 2 से 6 नवंबर के बीच केवल सीएसआईआर-नीरी और पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (पीईएसओ) से वैध मंजूरी प्राप्त निर्माता ही अधिकृत ग्रीन पटाखों का उत्पादन कर सकेंगे। इनकी बिक्री जिला प्रशासन की ओर से निर्धारित बाजारों में लाइसेंसधारी विक्रेताओं के माध्यम से ही होगी। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर ऑनलाइन बिक्री और घर तक डिलीवरी पर रोक रहेगी। पैकेट सीलबंद होने चाहिए, ताकि उनमें पारंपरिक पटाखों की मिलावट न की जा सके। लंबी जुड़ी हुई लड़ियों (लड़ी) और बेरियम युक्त पटाखों पर भी प्रतिबंध रहेगा। निर्माताओं और कारोबारियों को निर्धारित वित्तीय सुरक्षा जमा करनी होगी। नियमों का उल्लंघन या नकली उत्पाद बेचने पर यह राशि जब्त करने के साथ लाइसेंस रद्द किया जा सकता है।

क्यूआर कोड से होगी असली ग्रीन पटाखों की पहचान

उपभोक्ताओं को प्रमाणित ग्रीन पटाखों की पहचान करने में मदद के लिए पैकेट पर क्यूआर कोड अनिवार्य किया गया है। स्मार्टफोन से इसे स्कैन कर खरीदार निर्माता की जानकारी, सीएसआईआर-नीरी पंजीकरण, पीईएसओ या संबंधित लाइसेंस और परीक्षण प्रमाणन की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। क्यूआर कोड को एक पैकेट से दूसरे पैकेट पर स्थानांतरित नहीं किया जा सकेगा। इसका उद्देश्य सामान्य पटाखों को ग्रीन पटाखे बताकर बेचने की धोखाधड़ी रोकना है। दिल्ली-एनसीआर के बाहर से पटाखे खरीदकर या लाकर इस्तेमाल करने पर भी रोक लगाई गई है। इसके अलावा अस्पतालों, नर्सिंग होम, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, वृद्धाश्रमों, शैक्षणिक संस्थानों और निर्धारित साइलेंस जोन के 300 मीटर के दायरे में पटाखे फोड़ने की अनुमति नहीं होगी। इन क्षेत्रों को नो-क्रैकर जोन के रूप में चिह्नित किया जाएगा। पुलिस और प्रशासन की टीमें अवैध भंडारण और बिक्री पर निगरानी रखेंगी तथा दिल्ली-एनसीआर में प्रवेश करने वाले वाहनों की जांच भी की जाएगी।

प्रदूषण और स्वास्थ्य प्रभावों पर रहेगी निगरानी

दिवाली के दौरान और उसके बाद प्रदूषण की स्थिति का आकलन करने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को 2 से 30 नवंबर तक वायु गुणवत्ता की दैनिक रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। खराब पड़े एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशनों को तुरंत ठीक कर लगातार निगरानी सुनिश्चित करने को कहा गया है। इसके साथ ही पानी और रेत के नमूने लेकर तुलनात्मक पर्यावरणीय आकलन किया जाएगा। दिवाली के बाद प्रदूषण से संबंधित अस्पतालों में भर्ती मरीजों और मौतों का आंकड़ा भी जुटाया जाएगा, ताकि स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन हो सके। संबंधित राज्य सरकारों को 14 दिसंबर तक आदेश के पालन की जानकारी देते हुए हलफनामा प्रस्तुत करना होगा। नियमों के पालन में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो सकती है। यह व्यवस्था त्योहार की परंपरा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है, लेकिन इसकी सफलता निर्माताओं, विक्रेताओं, प्रशासन और आम नागरिकों की जिम्मेदारी से नियमों का पालन करने पर निर्भर करेगी।