- वन्यजीव सप्ताह में संरक्षणवादियों ने 15 किमी पैदल चलकर सुरक्षित कॉरिडोर की उठाई मांग

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चंद्रपुर। विदर्भ के जंगलों में बाघों और अन्य वन्यजीवों की आवाजाही के लिए महत्वपूर्ण कॉरिडोर अब रेल पटरियों के कारण खतरे में हैं। हबिटेट कंजर्वेशन सोसायटी के रिकॉर्ड के अनुसार, 2017 से 2026 के बीच चंद्रपुर जिले में बल्लारशाह-गोंदिया रेल लाइन पर 140 से अधिक वन्यजीवों की मौत हो चुकी है। इनमें 17 बाघ भी शामिल हैं। वन्यजीव सप्ताह के अवसर पर 4 अक्टूबर को सोसायटी के सदस्यों ने वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन के लिए करीब 15 किलोमीटर की ‘वॉक फॉर वाइल्डलाइफ कॉरिडोर’ यात्रा की। चांदा फोर्ट रेलवे स्टेशन से चिंचपल्ली तक करीब तीन घंटे चले इस अभियान का उद्देश्य वन्यजीवों के लिए सुरक्षित रास्ते सुनिश्चित करने की मांग को प्रमुखता से उठाना था।
बाघों के साथ गौर, चीतल और भालू भी बने शिकार
सोसायटी वर्ष 2017 से इस रेल ट्रैक पर वन्यजीवों की गतिविधियों और मौतों की निगरानी कर रही है। उसके रिकॉर्ड में 27 गौर, 26 चीतल, 19 सांभर, 15 स्लॉथ भालू, 7 तेंदुए और 4 लकड़बग्घों की मौत भी दर्ज है। संरक्षणवादियों के अनुसार, जंगलों के बीच से गुजरने वाली रेल लाइन पर वन्यजीवों के ट्रैक पार करने के दौरान हादसे होते हैं। कई प्रजातियां भोजन, पानी, नए क्षेत्र और प्रजनन के लिए एक जंगल से दूसरे जंगल की ओर जाती हैं। ऐसे में रेल पटरियां और सड़कें उनके प्राकृतिक आवागमन में बाधा बन रही हैं। वन्यजीव सप्ताह के दौरान आयोजित पैदल मार्च के जरिए संरक्षण कार्यकर्ताओं ने इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए सुरक्षित वन्यजीव मार्ग विकसित करने की मांग रखी।
ताडोबा से कवाल तक जुड़ा अहम वन्यजीव कॉरिडोर
यह क्षेत्र महाराष्ट्र के ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व और तेलंगाना के कवाल टाइगर रिजर्व को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण वन्यजीव कॉरिडोर का हिस्सा है। इस मार्ग का इस्तेमाल बाघ सहित कई वन्यजीव नए क्षेत्रों की तलाश, आवाजाही और प्रजनन के लिए करते हैं। संरक्षणवादियों का कहना है कि केवल जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों को बचाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके बीच मौजूद प्राकृतिक रास्तों को भी सुरक्षित रखना जरूरी है। रेल लाइन, सड़क और हाईवे जैसे बुनियादी ढांचे के कारण इन मार्गों के खंडित होने से वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित हो रही है। ‘वॉक फॉर वाइल्डलाइफ कॉरिडोर’ के माध्यम से संरक्षणवादियों ने मांग की कि विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय वन्यजीवों के पारंपरिक आवागमन मार्गों को ध्यान में रखा जाए और ऐसे स्थानों पर सुरक्षित क्रॉसिंग की व्यवस्था की जाए।