‘सार्वजनिक बैंक बेचने की संपत्ति नहीं, राष्ट्र निर्माण का माध्यम’, IDBI बैंक कर्मचारियों के समर्थन में उतरे राहुल गांधी

    30-Oct-2026
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- कनाडा की फेयरफैक्स कंपनी को 60.72% हिस्सेदारी बेचने के फैसले पर उठाए सवाल
- बोले- निजीकरण से आरक्षण और कर्मचारियों की सुरक्षा पर पड़ेगा असर

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एबी न्यूज़ नेटवर्क।
IDBI बैंक के विनिवेश को लेकर सियासी विवाद गहराता जा रहा है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बैंक के कर्मचारियों के समर्थन में उतरते हुए केंद्र सरकार के निजीकरण के फैसले पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल बेचने की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। राहुल गांधी ने 29 अक्टूबर को IDBI बैंक के कर्मचारियों के नाम एक खुला पत्र जारी कर उनके संघर्ष के प्रति एकजुटता जताई। उन्होंने बताया कि पिछले साल मार्च में बैंक के कुछ कर्मचारी संसद भवन में उनसे मिलने आए थे। कर्मचारियों ने सवाल उठाया था कि जिस बैंक को उन्होंने मेहनत से घाटे से निकालकर मुनाफे में पहुंचाया, उसे सरकार क्यों बेच रही है? राहुल ने कहा कि उन्होंने यह सवाल लोकसभा में भी उठाया था और सरकार से पूछा था कि बैंक के कर्मचारियों तथा जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा कैसे होगी, लेकिन उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। अब सरकार ने बैंक को कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स को बेचने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक धन से बनी संस्था पर जनता का अधिकार होता है और उसके भविष्य से जुड़े फैसलों में कर्मचारियों तथा आम लोगों के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

7 साल पहले घाटे में था बैंक
राहुल गांधी ने IDBI बैंक की आर्थिक स्थिति में आए बदलाव का उल्लेख करते हुए कहा कि सात साल पहले बैंक घाटे में चल रहा था, जबकि पिछले वर्ष उसने 9 हजार करोड़ रुपए से अधिक का मुनाफा कमाया। उन्होंने इस बदलाव का श्रेय बैंक कर्मचारियों की मेहनत को दिया। उनके अनुसार, वर्तमान में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के पास बैंक की करीब 95 प्रतिशत हिस्सेदारी है, लेकिन प्रस्तावित बिक्री के बाद यह घटकर 34 प्रतिशत रह जाएगी। राहुल ने 2003 में संसद में सरकार की ओर से किए गए उस वादे का भी जिक्र किया, जिसमें IDBI बैंक में कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि भले ही यह वादा कानून में दर्ज न हो, लेकिन संसद में किया गया वादा देश की जनता से किया गया वादा होता है। राहुल ने आशंका जताई कि बैंक के निजी हाथों में जाने से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। साथ ही कर्मचारियों की सेवा शर्तों और अधिकारों पर भी असर पड़ सकता है।

53 हजार करोड़ में होगी हिस्सेदारी की बिक्री
केंद्र सरकार ने 14 अक्टूबर को IDBI बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को करीब 53 हजार करोड़ रुपए में बेचने की मंजूरी दी थी। इसमें केंद्र सरकार की 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी करीब 26,620 करोड़ रुपए और LIC की 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी करीब 26,440 करोड़ रुपए की है। कनाडाई अरबपति प्रेम वत्सा के नेतृत्व वाली फेयरफैक्स ने प्रति शेयर 81 रुपए की बोली लगाई है, जो दो स्वतंत्र मूल्यांकन एजेंसियों द्वारा तय 75.99 रुपए के उचित मूल्य से अधिक है। सरकार के अनुसार, यह किसी भारतीय बैंक में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश हो सकता है। हालांकि, इस सौदे को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नियामकीय मंजूरी मिलना बाकी है। मौजूदा वित्त वर्ष के अंत तक सौदा पूरा होने की उम्मीद है। इस बीच बैंक यूनियन और अन्य पक्षों ने बैंक के मूल्यांकन तथा बोली की कीमत को लेकर सवाल उठाए हैं।

बोली प्रक्रिया पर DIPAM की सफाई
विनिवेश प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के बीच निवेश एवं लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) ने स्पष्ट किया है कि दूसरे दौर की बोली प्रक्रिया कैबिनेट की आर्थिक मामलों की समिति (CCEA) से अधिकृत विनिवेश सचिवों के कोर ग्रुप (CGD) द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत पूरी की गई। विभाग के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में आयोजित पहले दौर की बोलियां मंजूर नहीं हुई थीं, जिसके बाद वह प्रक्रिया समाप्त हो गई। दूसरे दौर में न तो रिजर्व प्राइस घटाया गया और न ही बढ़ाया गया। DIPAM ने बताया कि बोली लगाने वाली कंपनियां बैंक का स्वतंत्र मूल्यांकन कर गोपनीय तरीके से अपनी पेशकश करती हैं। स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा तय उचित मूल्य से बोली की कीमत कम या अधिक हो सकती है। यदि सबसे ऊंची बोली रिजर्व प्राइस से कम रहती है, तो आगे का निर्णय सरकार लेती है। दूसरी ओर, राहुल गांधी ने कर्मचारियों से एकजुट रहने और अपने जायज अधिकारों की लड़ाई जारी रखने की अपील की है।