- छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग पर भूख हड़ताल जारी
- सरकार की कार्रवाई पर उठाए सवाल

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नई दिल्ली। दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर जारी छात्र आंदोलन का समर्थन किया है। फेसबुक पर साझा किए गए एक वीडियो में उन्होंने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ बताते हुए सरकार की आलोचना की। शाह की यह टिप्पणी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण के बाद चर्चा में आए इस शब्द के संदर्भ में सामने आई है। जामिया के छात्र विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल कर रहे हैं। शाह ने अपने वीडियो में छात्रों के आंदोलन, युवाओं की आवाज और शैक्षणिक संस्थानों में विरोध प्रदर्शनों से निपटने के सरकार के तरीके पर सवाल उठाए। उनके बयान के बाद विश्वविद्यालय परिसरों में छात्र राजनीति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकार के प्रति असहमति जताने के अधिकार को लेकर बहस फिर तेज हो गई है।
‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर जताया गर्व
फेसबुक वीडियो में नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व है। उन्होंने ‘राष्ट्रविरोधी’ और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ जैसे संबोधनों का भी जिक्र किया। शाह ने अपने बयान में सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि देश में यदि कोई ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ है, तो वह उनके मुताबिक मौजूदा सरकार है। उनके इस बयान को सरकार के आलोचकों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले राजनीतिक संबोधनों के संदर्भ में देखा जा रहा है। शाह की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब जामिया के छात्र छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग पर आंदोलन कर रहे हैं। विश्वविद्यालय में वर्ष 2006 में छात्रसंघ भंग कर दिया गया था। इसके बाद से छात्र प्रतिनिधित्व और चुनाव की बहाली का मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है। मौजूदा प्रदर्शन में छात्र चुनाव बहाल करने की मांग कर रहे हैं।
युवाओं और शैक्षणिक संस्थानों को लेकर सरकार से सवाल
नसीरुद्दीन शाह ने वीडियो में सरकार से सवाल किया कि आखिर युवाओं का हौसला तोड़ने, शैक्षणिक संस्थानों को नुकसान पहुंचाने और लोकतंत्र को खतरे में डालने की कितनी कोशिशें की जाएंगी। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हुए विरोध प्रदर्शनों का उल्लेख किया। शाह ने कहा कि इन संस्थानों में छात्रों के साथ हुई घटनाओं और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई को याद रखा जाएगा। उनके अनुसार, पहले जेएनयू, फिर सत्यजीत रे फिल्म संस्थान और अब जामिया में छात्रों के साथ कथित दमन का मामला सामने आया है। शाह की टिप्पणी ने छात्र आंदोलनों के दौरान प्रशासन की भूमिका, युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों और शैक्षणिक संस्थानों की स्वतंत्रता से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है।
भाजपा की आलोचना को लेकर पहले भी रहे मुखर
नसीरुद्दीन शाह इससे पहले भी भाजपा सरकार की नीतियों और छात्र आंदोलनों से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करते रहे हैं। हालिया वीडियो से कुछ दिन पहले उन्होंने सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में हुए विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में भी भाजपा की आलोचना की थी। एक अन्य वीडियो में उन्होंने पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद पार्टी के रवैये पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया था कि भाजपा उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की कोशिश कर रही है, जो उसकी विचारधारा और नीतियों से सहमत नहीं हैं। शाह के ये बयान सरकार के प्रति उनकी सार्वजनिक आलोचनात्मक भूमिका को दर्शाते हैं। उनके ताजा वक्तव्य ने एक बार फिर राजनीतिक असहमति, विरोध प्रदर्शन और कलाकारों के सार्वजनिक बयानों को लेकर चर्चा को बढ़ावा दिया है।
छात्रसंघ चुनाव बहाली की मांग पर टिकी नजरें
जामिया में जारी भूख हड़ताल के बीच अब छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग प्रमुख मुद्दा बनी हुई है। छात्र विश्वविद्यालय में अपने प्रतिनिधियों के चुनाव के जरिए छात्र हितों से जुड़े मामलों में भागीदारी चाहते हैं। नसीरुद्दीन शाह के समर्थन से इस आंदोलन को व्यापक सार्वजनिक चर्चा मिली है। उनके बयान ने यह सवाल भी उठाया है कि विश्वविद्यालय परिसरों में विरोध जताने वाले छात्रों के साथ किस तरह व्यवहार किया जाना चाहिए और छात्र प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए। फिलहाल छात्रों की मांग, विश्वविद्यालय प्रशासन की प्रतिक्रिया और आंदोलन के आगे के घटनाक्रम पर नजर बनी हुई है।