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गड़चिरोली।
एटापल्ली तहसील में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली ने एक और ज़िंदगी छीन ली। नौ माह की गर्भवती (Pregnant) आशा संतोष किरंगा (24), जिन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हुई, मजबूरी में अपने पति के साथ करीब 6 किलोमीटर पैदल चलने को विवश हुईं। आलंदी टोला निवासी यह दंपत्ति पास में किसी स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में अपनी बहन के गांव की ओर मदद की उम्मीद लिए निकल पड़ा, लेकिन जंगलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरते हुए देर हो गई और ज़िंदगी उनसे दूर चली गई।
अस्पताल पहुंचने के बाद भी नहीं बच सकी दोनों की जान
कई घंटे की मशक्कत के बाद आशा को एंबुलेंस से हैदरी स्थित लॉयड्स काली अम्मल मेमोरियल अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की, लेकिन नवजात को बचाया नहीं जा सका। इसके तुरंत बाद आशा की हालत भी तेजी से बिगड़ने लगी और कुछ ही देर में उसने भी दम तोड़ दिया। यह दर्दनाक घटना 2 जनवरी की भोर में घटित हुई। शवों को पहले एटापल्ली ग्रामीण अस्पताल लाया गया, लेकिन वहां स्त्रीरोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होने से उन्हें पोस्टमार्टम के लिए आखिरकार अहेरी भेजना पड़ा। इस पूरी प्रक्रिया ने इलाके में **स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की गंभीर कमी और देरी** को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
लोगों में आक्रोश, जांच के आदेश
घटना के बाद स्थानीय लोगों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय पर चिकित्सा सुविधा मिल जाती, तो शायद यह दो ज़िंदगियां बच सकती थीं। इस बीच जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. प्रताप शिंदे ने बताया कि एएसएचए कार्यकर्ताओं ने गर्भावस्था के दौरान नियमित विज़िट की थीं, और महिला ने प्रसव पीड़ा शुरू होने के बाद ही पैदल चलना शुरू किया। उन्होंने यह भी कहा कि संभावित चूक या देरी का पता लगाने के लिए विस्तृत जांच के आदेश दे दिए गए हैं। हालांकि, इस हृदयविदारक घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दूरदराज आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? और कब तक जिंदगियां इन खामियों की कीमत चुकाती रहेंगी?