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नागपुर।
फरवरी 1985 में नागपुर (Nagpur) के अंबाझरी रोड स्थित मातृ सेवा संघ के बाहर एक नवजात शिशु को छोड़ दिया गया था। महज तीन दिन के उस बच्चे की मां 21 वर्ष की, अविवाहित और असहाय थी रिकॉर्ड में बस इतना ही दर्ज था। करीब एक माह तक आश्रम में रहने के बाद एक नर्स ने उसका नाम जन्म माह के आधार पर ‘फाल्गुन’ रखा। चालीस वर्ष बाद वही फाल्गुन बिन्नेनडाइक एक बार फिर नागपुर लौटे हैं इस उम्मीद में कि शायद वह महिला मिल जाए, जिसने उन्हें जन्म दिया और फिर ओझल हो गई। यह उनकी जन्मभूमि की तीसरी यात्रा है, जो स्मृतियों, प्रश्नों और भावनाओं से भरी है।
गोद लिया गया, पर सच कभी छिपा नहीं
कानूनी प्रक्रियाओं के बाद फाल्गुन को पहले मुंबई और फिर नीदरलैंड ले जाया गया, जहां एक डच दंपति ने उन्हें गोद लिया। प्रेमपूर्ण वातावरण में पले-बढ़े फाल्गुन के लिए गोद लेने की सच्चाई कभी रहस्य नहीं रही “सब कुछ खुली किताब की तरह था,” वे कहते हैं। 18 वर्ष की उम्र में 2006 में वे पहली बार भारत लौटे। भाषा और चेहरों में उन्हें अजीब-सी अपनापन महसूस हुआ। महाभारत पढ़ने के बाद कर्ण का चरित्र उनके मन में बस गया “हर कर्ण को अपनी कुंती से मिलने का अवसर मिलना चाहिए,” इसी भाव ने उन्हें अपनी जैविक मां की खोज के लिए प्रेरित किया।
मेयर बनने के बाद भी अधूरी कहानी
2017 में उद्देश्य के साथ लौटकर फाल्गुन ने मातृ सेवा संघ के रिकॉर्ड खंगाले। मां का नाम तो मिला, पर पता नहीं। जीवन आगे बढ़ा विवाह हुआ, चार बच्चों के पिता बने और राजनीति में कदम रखकर एम्स्टर्डम के पास हीम्स्टेड के मेयर चुने गए। फिर भी मन में एक खालीपन रहा। पत्नी के प्रोत्साहन से अगस्त 2024 में वे फिर आए, लेकिन तलाश फिर ठहर गई। दिसंबर 2025 में एक अहम सुराग मिला संघ की सेवानिवृत्त नर्स से मुलाकात, जिन्होंने कभी उन्हें नाम दिया था। पहचानते ही दोनों की आंखें भर आईं। मां के प्रति फाल्गुन के मन में कोई कड़वाहट नहीं “मैं बस कहना चाहता हूं कि मैं ठीक हूं, खुश हूं और प्यार में पला हूं।” उन्होंने अपने बच्चों को भारतीय-डच नाम दिए हैं, एक बेटी का नाम अपनी जैविक मां के नाम पर रखा है। अगले वर्ष वे फिर नागपुर लौटेंगे खोज जारी है।